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जश्ने आजादी: देशभक्ति का जज्बा, बीकानेर रियासत में 9 दिसम्बर 1942 को हुआ झण्डा सत्याग्रह

9 दिसम्बर, 1942, दोपहर के दो बजे थे, तभी बैदों का चौक में एक नौजवान आया और तिरंगा फहरा दिया।
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independence day special

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बीकानेर. 9 दिसम्बर, 1942, दोपहर के दो बजे थे, तभी बैदों का चौक में एक नौजवान आया और तिरंगा फहरा दिया। बीकानेर रियासत में पहली बार तिरंगा फहराए जाने पर जनसमूह चौक में उमड़ पड़ा और पूरा प्रांगण देशभक्ति के नारों से गूंज उठा। चौक में मौजूद जनता के मन में मानो देशभक्ति की लहर हिलोरें ले रही थी। यह साहस और वीरता भरा काम किया बीकानेर के रामनारायण शर्मा ने। इसके बाद तो हर कोई तिरंगे को छूने को लालायित हो गया और लोगों में देश को आजाद कराने को लेकर जोश और जुनून छा गया।

बैदों के चौक में तिरंगा लहराते ही लोगों में देशभक्ति का ज्वार उमड़ पड़ा। इसके बाद रामनारायण तिरंगा लेकर शहर की सड़कों पर निकल पड़े तो उनके साथ शहरवासी भी जुड़ते गए। वे मोहता चौक होते हुए दाऊजी चौक तक पहुंचे। इस दौरान सड़कों के दोनों ओर बड़ी संख्या में खडे़ लोगों ने भी उनके अदम्य साहस और देश की आजादी के लिए नारे लगाए। दाऊजी मंदिर तक उमडे़ शहरवासियों ने एक जुलूस का रूप ले लिया। हालांकि तिरंगा फहराने और इन्कलाब जिंदाबाद के नारे लगाने पर युवक रामनारायण को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन इससे लोगों में देशभक्ति का जज्बा और बढ़ गया।

सत्याग्रह से बढ़ा जोश
१९४२ में आजादी का आन्दोलन चल रहा था, उससे बीकानेर भी अछूता नहीं था। सत्यदेव विद्यालंकर की ओर से संपादित पुस्तक 'बीकानेर का राजनीतिक विकास और मघाराम वैद्यÓ में 'बीकानेर में तिरंगाÓ शीर्षक से इस घटना का विशेष उल्लेख किया गया है। पुस्तक में बताया गया है कि बीकानेर में प्रजा परिषद के कार्यकर्ता लोगों में देश की आजादी को लेकर चेतना फैलाने के काम में जुटे हुए थे, लेकिन विशेष सफलता नहीं मिल रही थी। फिर स्वतंत्रता सेनानी वैद्य मघाराम शर्मा ने अपने सहयोगियों के साथ झण्डा सत्याग्रह शुरू करने का निश्चय किया। यह सत्याग्रह ९ दिसम्बर, १९४२ को शुरू हुआ, जब वैद्य मघराम शर्मा के पुत्र रामनारायण ने बीकानेर रियासत में पहली बार तिरंगा फहराया।


तिरंगा फहराने पर चला मुकदमा
पुस्तक में उल्लेख किया गया है कि पुलिस रामनारायण को गिरफ्तार करने के बाद कोतवाली थाना ले गई। बाद में सिविल कोतवाली के दफ्तर में यातनाएं दी गई। गिरफ्तारी के चार-पांच दिन बाद वैद्य मघाराम ने रामनारायण को जमानत पर छुड़वा लिया, लेकिन रामनारायण के विरुद्ध तिरंगा फहराने पर मुकदमा चलता रहा।

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