
'खम्भ फाड़कर प्रकट्य भये प्रभु, यह अचरज तेरी माया...भक्त प्रहलाद बचायो।Ó नृसिंह भगवान भक्त प्रहलाद को बचाने के लिए खम्भ को चीरकर बाहर निकले तो चारों ओर जयकारे गूंज उठे।

भगवान ने अधर्म का पर्याय बने हरिण्यकश्यप का वध कर धर्म की पताका फहराई। धर्म और अधर्म के बीच की यह लड़ाई शनिवार को शहर में साकार हुई। अवसर था नृसिंह जयंती महोत्सव का। नृसिंह भगवान की लीला देखने के लिए सैकड़ों श्रद्धालु उमड़े। कई स्थानों पर मेले भरे।

शाम पांच बजे बाद हरिण्यकश्यप, प्रहलाद व नृसिंह भगवान के स्वरूप का अवतरण हुआ। शाम को प्रतीकात्मक तौर पर नृसिंह भगवान ने हरिण्यकश्यप को अपनी जंघाओं पर रखकर उसका वध किया तो चारों ओर नृङ्क्षसह भगवान के जयकारे गूंज उठे।

इससे पूर्व सुबह सभी नृसिंह मंदिरों में पंचामृत अभिषेक व पूजन के अनुष्ठान हुए। अलग-अलग पोशाकों में नृसिंह भगवान का शृंगार किया गया। शाम को पंचामृत का वितरण किया गया। रात को आरती की गई।

शहर में सुबह से ही 'हरिणा-कृष्णा गोविन्दा प्रहलाद भजेÓ की ध्वनि गूंजने लगी। गली-मोहल्लों में छोटे बच्चों में अधिक उत्साह रहा। शाम पांच बजे बाद से हरिण्यकश्यप का रूप धरे युवा निकले। विशेष पोशाक व मुखौटे धारण किए हरिण्यकश्यप हवा में कौड़ा लहराता रहा।

बीच-बीच में भक्त प्रहलाद के जयकारे गूंजते रहे। नगाड़ों की ताल पर हरिण्यकश्यप ने कौड़े के साथ नृत्य किया। शाम छह बजे बाद मेलों में भगवान नृसिंह स्वरूप का अवरतरण हुआ। उनके दर्शन के लिए सैकड़ों लोगों की भीड़ जुटी।