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ग्रामीण अंचल से धीरे-धीरे सिमट रहा थार मरुस्थल

ग्रामीण अंचल से धीरे-धीरे सिमट रहा थार मरुस्थल

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Thar Desert

Thar Desert

महाजन. जिले के इस ग्रामीण अंचल में थार मरूस्थल धीरे-धीरे सिमट रहा है। मरूस्थलीय इलाका कम होने के कारण इन इलाकों में पायी जाने वाली वनस्पति भी लुप्तप्राय: होती जा रही है। खेती के तौर-तरीकों में समय के साथ आए बदलावों ने भी मरुस्थलीय वनस्पति को प्रभावित किया है।

एक जमाना था जब उत्तरी राजस्थान के इस महत्वपूर्ण मरुस्थलीय क्षेत्र में खेजड़ी, फोग, रोहिड़ा, बांवली, कूमठा जैसी वानस्पतिक पौधों की प्रजातियां बहुतायत में थी। परन्तु इंदिरा गांधी व कंवरसेन लिफ्ट नहर जैसी बड़ी परियोजनाओं की पहुंच के साथ ही सिंचिंत क्षेत्र में तेजी से बढ़ोतरी हुई।

नहरों के साथ खेती के तौर-तरीके भी बदल गए। नहरी पानी की पर्याप्त उपलब्धता के चलते ग्रामीण सालभर में ही दो से तीन फसलें लेने लगे। नहर व कुओं से सिंचित खेतों के विस्तार के साथ ही मरूस्थल सिमटता गया। इन इलाकों में पायी जाने वाली विभिन्न प्रजातियों के पौधे व झाडिय़ां भी गायब हो गई। अंचल में वृक्षों की अंधाधुंध कटाई होने से ये उपयोगी वनस्पतियां लुप्तप्राय: हो चुकी है।

पहले थी बहार
यहां दो दशक पूर्व तक यह वनस्पतियां सामान्यत: खेतों व रेतीले धोरों में मिल जाती थी। ये सभी वनस्पतियां दवाइयों के साथ-साथ अन्य काम भी आती थी। लेकिन धोरों का लेवलिंग करने से ये वनस्पतियां लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है। बांवली, कूमठा जैसी वनस्पतियों को काटना अपराध माना जाता था। इन दोनों वनस्पतियों का गोंद बहुपयोगी माना जाता था। कूमठे का गोंद जहां दवाइयों में उपयोगी माना जाता है वहीं बांवली के गोंद प्रसूता को खिलाया जाता था।

फील्ड फायरिंग रेंज एरिया के लम्बे-चौड़े क्षेत्र में भी इन वनस्पतियों की भरमार थी परन्तु धन के लिए जलाऊ लकड़ी की कमी होने के इन्हें भी नहीं बख्सा। फोग का अस्तित्व मिटने से जहां ऊंटों के लिए चारे का संकट गहराने लगा है वहीं ईधन के लिए भी परेशानी बढ़ गई है। क्षेत्र में रोहिड़ा तो दर्शनों को भी उपलब्ध नहीं है।

रोहिड़े की लकड़ी से बने मजबूत मांचे आज भी इसकी उपयोगिता बयान कर रहे है। इन प्राकृतिक धरोहरों के प्रति जागरूकता का अभाव होने से ये लुप्त होने लगी है। तीर्थराज संस्कर्ता सेवानिवृत व्याख्याता के अनुसार क्षेत्र में रोहिड़ा, बांवली, कूमठा, फोग जैसी वनस्पति सिमट गई है। जागरूकता का अभाव व वन विभाग के द्वारा प्रयास नहींं करने से आज ये बहुपयोगी वनस्पतियां देखने को भी नहीं मिल रही है।

इनमें आई गिरावट
रेतीले क्षेत्र में पाई जाने वाली डचाब, बूर, खींप, फोग, सेवण, थोर, तुम्बा, खेजड़ी, कैर, भांखड़ी, बेर की झाडिय़ां, जाळ, रींगणी सहित अन्य कई उपयोगी वनस्पतियों में तेजी से गिरावट आई है।