
ये हैं रीयल बाहुबली...सेना कम थी, गाय-भैंसों की सींगों पर बांधी मशालें, ऐसे हराया मुगलों को
बीकानेर. भारतीय इतिहास में हुए भीषणतम युद्धों में बीकानेर शहर की धरती पर हुआ राती घाटी युद्ध प्रमुख है। यह युद्ध लाहौर अधिपति व मुगल बादशाह अकबर के पुत्र कामरां व बीकानेर नरेश राव जैतसी के बीच सन 1534 में हुआ था। इस युद्ध में राव जैतसी की ओर से तत्कालीन राजपूताना की विभिन्न रियासतों के साथ गुजरात, सिंध, मध्यप्रदेश की कई रियासतों की सेनाओं ने भाग लिया। इतिहासकारों के अनुसार रातीघाटी पहला युद्ध था, जो करीब 21 घंटे लगातार दिन व रात चला। इस युद्ध में राव जैतसी की निर्णायक जीत हुई। युद्ध का जयघोष राम-राम था। छापामार पद्धति का उपयोग भी इस युद्ध में हुआ। राती घाटी युद्ध को उस समय का राष्ट्रीय युद्ध भी कहा जाता है। इस युद्ध में निर्णायक जीत के लिए 108 सेनापतियों व एक प्रधान सेनापति ने भाग लिया। भुजिया बाजार स्थित जैन मंदिर में लगा शिलालेख भी इस युद्ध का प्रमाण है। कामरां ने भागते समय इस मंदिर को भी नुकसान पहुंचाया था।
भैंसों व बैलों के सींग पर बांधी मशाले
कामरां की सेना विशाल थी। जिसके मुकाबले में राव जैतसी की बहुत कम थी। कामरां की सेना के पास तोपे व हथियार भी थे। इतिहासकार जानकी नारायण श्रीमाली के अनुसार युद्ध के दिन बड़ी संख्या में भैंसों व बैलों के सींगों पर मशाले बांध दी गई। ऊंटों की पलाण पर भी मशाले बांध कर जला दी गई। बैलों व भैंसों को जंगलों में इधर-उधर छोड़ने के साथ सौभाग्यदीप की ओर भेजा गया। दूर से मशाले किसी विशाल सेना के रूप में दिखाई दी। इससे कामरां की सेना में भय का माहौल बना।
शहर करवाया खाली
कामरां के हमले की सूचना मिलने पर राव जैतसी ने नगरवासियों को शहर से दूर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया। इतिहासकार श्रीमाली बताते है कि करीब 2500 सैनिकों को ही सौभाग्यदीप दुर्ग में रखने के साथ शेष सेना को भी शहर से दूर जंगलों में लेकर चले गए। मार्गशीर्ष कृष्णा की चतुर्थी तिथि संवत 1591 के दिन कामरां जब बीकानेर शहर में पहुंचा तो उसे शहर खाली व उजड़ा लगा। सौभाग्यदीप जहां आज नगर सेठ लक्ष्मीनाथ मंदिर है, कामरां की सेना ने हमला बोल दिया। अंधेरा छाने के बाद राव जैतसी व विभिन्न रियासतों के 108 सेनापतियों ने हमला कर कामरां की सेना को चारों तरफ से घेर लिया। रात भर युद्ध चला। कामरां को युद्ध से भागना पड़ा। भागते समय कामरां का छत्र छोटडि़यां गांव में गिर गया था।
शहर की ढलाने व तंग गलियां बनी रोड़ा
कामरां की सेना बीकानेर शहर की संकरी गलियों, ऊंची-नीची ढलानों से वाकिफ नहीं थी। कामरां की सेना सौभाग्यदीप की ओर पहुंच गई, लेकिन पीछे से राव जैतसी की सेना की ओर से हमला करने से कामरां के सैनिक घिर गए। मध्यरात्रि बाद आखिर कामरां को युद्ध में पराजय मिलते देख भागना पड़ा।
छंद राव जैतसी रो में उल्लेख
राती घाटी युद्ध में भाग लेने वाले राव जैतसी के दरबारी कवि बिठू सूजा ने इस युद्ध का आंखों देखा वर्णन छंद रूप में किया। राती घाटी शोध एवं विकास समिति के महामंत्री जानकी नारायण श्रीमाली के अनुसार राजस्थानी साहित्यकार डॉ. एल पी टैस्सीटोरी ने सन 1917 में इस डिंगल भाषा के ग्रंथ का अंग्रेजी में अनुवाद किया। जिसका सार कोलकाता से भी प्रकाशित हुआ। बीकानेर के इतिहासकार ठाकुर रामसिंह तंवर, नरोत्तम स्वामी, डॉ. सूर्यकरण पारीक ने 1931 में ग्रंथ के अनुवाद का बीड़ा उठाया। राजवी अमरसिंह ने 1986 में छंद राव जैतसी का हिंदी व अंग्रेजी में अनुवाद प्रकाशित किया।
इसलिए राती घाटी
सौभाग्यदीप के पास लाल रंग की मिट्टी जिसे स्थानीय बोली में राती मिट्टी कहा जाता है की खदाने होने के कारण, इस क्षेत्र को राती घाटी कहा गया। यह युद्ध इस क्षेत्र में लडे़ जाने के कारण इसे राती घाटी का युद्ध कहा जाता है।
Published on:
13 Nov 2022 02:45 am
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