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Bilaspur High Court: स्थगन आदेश के बावजूद सुनवाई पर हाईकोर्ट सख्त, फैमिली कोर्ट का फैसला निरस्त, जानें पूरा मामला

Bilaspur High Court: हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि संबंधित फैमिली कोर्ट जज से 15 दिनों के भीतर स्पष्टीकरण लिया जाए कि स्टे आदेश के बावजूद उन्होंने सुनवाई क्यों जारी रखी।
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Bilaspur High Court

Bilaspur High Court: (photo-patrika)

Bilaspur High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक पारिवारिक केस में स्थगन आदेश के बाद भी सुनवाई कर फैसला देने पर सख्त नाराजगी जताई है। मामले में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के प्रोसिडिंग ऑफिसर को शोकाज नोटिस जारी कर 15 दिन में जवाब मांगा है। मामला रायगढ़ फैमिली कोर्ट का है।

याचिकाकर्ता ने सिविल सूट (परिवारिक विवाद) को रायगढ़ फैमिली कोर्ट से अन्य सक्षम न्यायालय में स्थानांतरित करने की मांग की थी। आरोप लगाया कि कोर्ट स्टाफ और प्रतिवादी की मिलीभगत से कार्यवाही प्रभावित हो रही है, लगातार तारीखें दी जा रही हैं। प्रकरण में देरी की जा रही है, जिससे निष्पक्ष सुनवाई पर संदेह है।

संबंधित फैमिली कोर्ट जज से लिया जाएगा स्पष्टीकरण

हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि संबंधित फैमिली कोर्ट जज से 15 दिनों के भीतर स्पष्टीकरण लिया जाए कि स्टे आदेश के बावजूद उन्होंने सुनवाई क्यों जारी रखी। यह रिपोर्ट मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रशासनिक पक्ष में प्रस्तुत की जाएगी।

हाईकोर्ट की रोक के बाद भी फैमिली कोर्ट में सुनवाई

हाईकोर्ट ने 10 मार्च 2026 को इस मामले की सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत देते हुए सिविल सूट की कार्यवाही पर रोक (स्टे) लगा दी थी। इसके बावजूद फैमिली कोर्ट के प्रोसिडिंग ऑफिसर (जज)ने उसी दिन और 12 मार्च को भी मामले की सुनवाई कर भरण-पोषण का आदेश जारी कर दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित जज को स्टे आदेश की जानकारी थी, इसके बावजूद उन्होंने न केवल आवेदन पर आदेश पारित किया, बल्कि भरण-पोषण राशि को लेकर याचिकाकर्ता के खिलाफ टिप्पणियां भी कीं।

हाईकोर्ट की रोक के बाद निचली अदालत को अधिकार नहीं

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि, जब किसी उच्च न्यायालय द्वारा कार्यवाही पर रोक लगा दी जाती है, तो निचली अदालत अपना अधिकार खो देता है। ऐसी स्थिति में ट्रायल कोर्ट को आगे की कार्यवाही करने का अधिकार नहीं रहता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 10 मार्च और 12 मार्च 2026 के सभी आदेशों को अवैध मानते हुए निरस्त कर निर्देश दिया कि संबंधित आवेदन पर दोबारा कानून के अनुसार सुनवाई की जाए।

सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के वकीलों ने बताया कि, संबंधित ऑफिसर का तबादला हो चुका है और नए अधिकारी ने पदभार ग्रहण कर लिया है। इस पर कोर्ट ने कहा कि अब ट्रांसफर याचिका का कोई औचित्य नहीं बचता, इसलिए इसे निराकृत किया जाता है।

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