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छत्तीसगढ़ के 5 हजार स्कूलों में लड़कियों के लिए टॉयलेट नहीं, हाईकोर्ट ने सरकार को लताड़ा, सचिव से मांगा जवाब

Bilaspur High court: बिलासपुर हाईकोर्ट ने प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बुनियादी को लेकर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। खासकर स्कूलों में लड़कियों के लिए टॉयलेट नहीं होने को लेकर सरकार को लताड़ा है..
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बिलासपुर

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Chandu Nirmalkar

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Updated: 7 Apr 2026, 2:55 PM IST

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छत्तीसगढ़ के 5 हजार स्कूलों में लड़कियों के लिए टॉयलेट नहीं ( Photo - Patrika )

Bilaspur High court: प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव पर बिलासपुर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। प्रदेश के 5,000 से अधिक स्कूलों में छात्राओं के लिए पृथक शौचालय की सुविधा न होने को कोर्ट ने छात्राओं का उत्पीड़न करार दिया है। चीफ जस्टिस की खंडपीठ ने इसे लड़कियों द्वारा स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) का एक बड़ा कारण मानते हुए स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव से शपथ पत्र के साथ विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल टॉयलेट बनवा देना काफी नहीं है, उनका कार्यात्मक होना अनिवार्य है। कोर्ट ने अगली सुनवाई तक राज्य के उन सभी स्कूलों की सूची और कार्ययोजना मांगी है जहां सुविधाओं का अभाव है।

Bilaspur High court: कागजों में टॉयलेट, जमीन पर बदहाली

मीडिया रिपोर्टों पर संज्ञान लेते हुए की गई सुनवाई में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। राज्य में संचालित कुल 56,615 स्कूलों के दावों के विपरीत, जमीनी स्थिति भयावह है। करीब 4,070 स्कूलों में गर्ल्स टॉयलेट की सुविधा सिरे से गायब है। वहीं, जिन स्कूलों में टॉयलेट हैं, उनमें से 2,170 उपयोग के लायक नहीं हैं। 7,260 स्कूलों में लड़कों के लिए शौचालय नहीं हैं और 3,787 शौचालय जर्जर स्थिति में हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 8,000 से अधिक स्कूलों में शौचालयों की स्थिति इतनी खराब है कि छात्र और शिक्षक यूरिन इन्फेक्शन जैसी बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। बिलासपुर जिले में ही 160 से अधिक स्कूलों में यह समस्या विकराल है।

शिक्षा सचिव का शपथ पत्र-काम जारी है

सुनवाई के दौरान स्कूल शिक्षा सचिव ने कोर्ट में शपथ पत्र पेश कर स्वीकार किया कि बिलासपुर, रायपुर, कोरबा, बस्तर और जांजगीर-चांपा जैसे प्रमुख जिलों के स्कूलों में शौचालयों की भारी कमी है। विभाग ने दावा किया कि नए शौचालयों का निर्माण युद्धस्तर पर जारी है और जर्जर संरचनाओं की मरम्मत के लिए निर्देश जारी कर दिए गए हैं। हालांकि, कोर्ट ने इस जवाब पर असंतोष जताते हुए स्पष्ट किया कि समाचार रिपोर्टों से यह प्रमाणित होता है कि स्थिति में अब तक कोई संतोषजनक सुधार नहीं हुआ है।

स्कूल की बदहाली पर अलग से जवाब तलब

कोर्ट ने बिलासपुर के सिरगिट्टी स्कूल के मामले को भी गंभीरता से लिया है। यहां स्कूल के बीच मैदान में सरिया (लोहे की छड़ें) खुले में छोड़ दिए गए हैं, जिससे बच्चों के लिए गंभीर दुर्घटना का खतरा बना हुआ है। इस लापरवाही पर कोर्ट ने जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से अलग से जवाब मांगा है।

क्यों जरूरी है यह हस्तक्षेप?

  1. ड्रॉपआउट रेट: छात्राओं के लिए अलग और स्वच्छ शौचालय न होना माध्यमिक स्तर पर लड़कियों के स्कूल छोड़ने का सबसे प्रमुख कारण माना जाता है।
  2. संवैधानिक अधिकार: गरिमा के साथ शिक्षा प्राप्त करना मौलिक अधिकार है, जिसका अभाव स्वच्छ शिक्षा के माहौल पर सवाल खड़ा करता है।
  3. प्रशासनिक सुस्ती: सालों से प्रस्तावित और निर्माणाधीन के फेर में अटके प्रोजेक्ट्स बच्चों के स्वास्थ्य से समझौता कर रहे हैं।