
Chhattisgarh High Court(photo-patrika)
Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि परिवार के किसी सदस्य के सरकारी नौकरी में होने मात्र से अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। यदि मृतक कर्मचारी के परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है और वह आर्थिक संकट का सामना कर रहा है, तो उसके आवेदन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे केवल नियमों का हवाला देकर आवेदन खारिज करने के बजाय परिवार की वास्तविक परिस्थितियों और जरूरतों का आकलन करें।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने अंबिकापुर नगर निगम द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए सिंगल बेंच के फैसले को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति योजना का उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से उबारना है, इसलिए फैसले लेते समय मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
मामला अंबिकापुर नगर निगम में कार्यरत एक सफाई कर्मचारी के परिवार से जुड़ा है। कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो गई थी। परिवार में पत्नी, तीन बेटे और एक बेटी थे, जिनका पालन-पोषण मृतक कर्मचारी की आय पर निर्भर था। पिता के निधन के बाद उनके बेटे ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, लेकिन नगर निगम ने यह कहते हुए आवेदन निरस्त कर दिया कि उसकी मां पहले से ही सफाई कर्मचारी के रूप में कार्यरत हैं।
आवेदन निरस्त होने के बाद याचिकाकर्ता ने निगम से अपने मामले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया। उसने यह भी बताया कि इसी तरह की परिस्थितियों में अन्य लोगों को पहले अनुकंपा नियुक्ति दी जा चुकी है। मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर सिंगल बेंच ने नगर निगम का आदेश रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता को नियुक्ति देने के निर्देश दिए। इसके बाद नगर निगम कमिश्नर ने इस फैसले को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच में अपील दायर की थी।
नगर निगम की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि वर्ष 2013 की नीति के अनुसार यदि परिवार का कोई सदस्य सरकारी नौकरी में है, तो अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती। वहीं याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उसकी मां की आय बहुत कम है और इतने बड़े परिवार का भरण-पोषण उस वेतन से संभव नहीं है। इसलिए परिवार आज भी आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहा है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूछा कि क्या अधिकारियों ने कभी यह जानने की कोशिश की कि परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति क्या है। अदालत ने कहा कि मुख्य कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के बाद परिवार किन परेशानियों से गुजर रहा है, इसका मूल्यांकन किए बिना आवेदन खारिज कर दिया गया।कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि परिवार का एक सदस्य कम वेतन वाली नौकरी में है, इससे यह साबित नहीं होता कि पूरा परिवार आर्थिक रूप से सुरक्षित हो गया है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में हर परिवार की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए प्रत्येक मामले की अलग से जांच और मूल्यांकन किया जाना चाहिए। सिर्फ नियमों की तकनीकी व्याख्या के आधार पर जरूरतमंद परिवारों को राहत से वंचित नहीं किया जा सकता। अधिकारियों को योजना के उद्देश्य और परिवार की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति कोई मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह सरकार की एक कल्याणकारी व्यवस्था है। इसका मकसद मृतक कर्मचारी के परिवार को अचानक आए आर्थिक संकट से राहत देना है। यदि अधिकारी केवल तकनीकी आधार पर आवेदन खारिज करेंगे, तो योजना का मूल उद्देश्य ही प्रभावित होगा।
अंत में हाईकोर्ट ने नगर निगम की अपील को खारिज कर दिया और सिंगल बेंच के आदेश को बरकरार रखा। इस फैसले से याचिकाकर्ता को बड़ी राहत मिली है। साथ ही यह निर्णय भविष्य में अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े कई मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
Updated on:
2 Jun 2026, 5:46 PM IST
Published on:
2 Jun 2026, 5:45 PM IST
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