
जमीन फर्जीवाड़े का बड़ा खुलासा (photo source- Patrika)
Property Fraud: बिलासपुर शहर में 15 साल पुराने एक जमीन फर्जीवाड़े के मामले ने एक बार फिर राजस्व रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और सरकारी दस्तावेजों में हेराफेरी के सवाल खड़े कर दिए हैं। सिविल लाइन थाना पुलिस ने एक जूता कारोबारी और तत्कालीन राजस्व अधिकारियों के खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचना और आपराधिक षड्यंत्र का मामला दर्ज किया है। आरोप है कि राजस्व रिकॉर्ड में कथित रूप से हेराफेरी कर 3 डिसमिल जमीन को 6 डिसमिल दर्शाया गया और बाद में उसे दो अलग-अलग लोगों को बेच दिया गया।
मामले में सिंधी कॉलोनी निवासी किशोर दयालानी सहित उस समय के पटवारी और अन्य राजस्व अधिकारियों की भूमिका जांच के दायरे में है। पुलिस का कहना है कि दस्तावेजों की जांच और शिकायत के आधार पर अपराध दर्ज कर आगे की विवेचना शुरू कर दी गई है।
जानकारी के अनुसार, किशोर दयालानी ने वर्ष 2009 में कस्तूरबा नगर, जरहाभाठा स्थित खसरा नंबर 54/25 की एक जमीन खरीदी थी। रजिस्ट्री दस्तावेजों और उस समय के राजस्व रिकॉर्ड के मुताबिक उक्त भूमि का कुल रकबा 0.012 हेक्टेयर था, जो लगभग 3 डिसमिल के बराबर माना जाता है। खरीद के समय उपलब्ध दस्तावेजों में भी इसी रकबे का उल्लेख था। लेकिन बाद में राजस्व अभिलेखों में जमीन के क्षेत्रफल को लेकर विवाद सामने आया।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि जमीन खरीदने के बाद तत्कालीन पटवारी और अन्य राजस्व अधिकारियों की कथित मिलीभगत से रिकॉर्ड में बदलाव किया गया। दस्तावेजों में कटिंग और ओवरराइटिंग कर भूमि का रकबा 0.012 हेक्टेयर से बढ़ाकर 0.024 हेक्टेयर दर्ज कर दिया गया। यानी कागजों में जमीन का आकार लगभग दोगुना कर दिया गया। आरोप है कि यह बदलाव सुनियोजित तरीके से किया गया ताकि भविष्य में अतिरिक्त भूमि की बिक्री की जा सके।
शिकायत के अनुसार, रिकॉर्ड में रकबा बढ़ने के बाद किशोर दयालानी ने जमीन को 3-3 डिसमिल के दो हिस्सों में विभाजित कर दिया। इसके बाद 14 मार्च 2011 को एक हिस्सा अनिल मोटवानी और दूसरा हिस्सा रेशमा मोटवानी के नाम रजिस्टर्ड कराया गया। आरोप है कि जिस जमीन का वास्तविक रकबा केवल 3 डिसमिल था, उसे दस्तावेजों में 6 डिसमिल दर्शाकर दो अलग-अलग लोगों को बेच दिया गया। इस प्रक्रिया में लाखों रुपये का आर्थिक लाभ कमाया गया।
यह पूरा मामला तब सामने आया जब प्रॉपर्टी निवेशक शंकर लाल दयालानी उक्त भूमि और उससे जुड़े मकान को खरीदने की तैयारी कर रहे थे। जमीन खरीदने से पहले उन्होंने सामान्य प्रक्रिया के तहत पुराने राजस्व रिकॉर्ड और स्वामित्व संबंधी दस्तावेजों की जांच कराई।
बताया जा रहा है कि उन्होंने वर्ष 2002 से 2011 तक के राजस्व अभिलेख निकलवाए। दस्तावेजों के तुलनात्मक अध्ययन के दौरान रिकॉर्ड में कथित कटिंग, ओवरराइटिंग और रकबे में बदलाव के संकेत मिले। संदेह होने पर उन्होंने पूरे मामले की विस्तृत जांच कराई और बाद में इसकी शिकायत संबंधित अधिकारियों तथा पुलिस से की।
शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने उपलब्ध दस्तावेजों, राजस्व रिकॉर्ड और अन्य तथ्यों की जांच की। प्रारंभिक जांच में आरोपों को गंभीर मानते हुए सिविल लाइन थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया। पुलिस ने धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित धाराओं के तहत अपराध कायम किया है। मामले में आगे की जांच जारी है और दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच भी कराई जा सकती है।
मामले में केवल जमीन के खरीदार या विक्रेता ही नहीं, बल्कि उस समय के राजस्व अमले की भूमिका भी जांच के केंद्र में है। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि रिकॉर्ड में बदलाव किस स्तर पर और किन परिस्थितियों में किया गया। जांच एजेंसियां यह भी देख रही हैं कि क्या यह केवल एक जमीन तक सीमित मामला है या फिर इसी तरह के अन्य मामलों में भी रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की गई है। यदि जांच में राजस्व अधिकारियों की संलिप्तता सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
जमीन फर्जीवाड़े का यह मामला सामने आने के बाद शहर में पुराने भूमि सौदों और राजस्व रिकॉर्ड की पारदर्शिता को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रिकॉर्ड में हेराफेरी के आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल एक व्यक्ति या एक सौदे का मामला नहीं होगा, बल्कि इससे कई अन्य पुराने जमीन मामलों की भी जांच का रास्ता खुल सकता है। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है। आने वाले दिनों में जांच के आधार पर नए खुलासे और अन्य लोगों की भूमिका भी सामने आ सकती है।
Published on:
14 Jun 2026 04:37 pm
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