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Success Story: अमेरिका में मिली जॉब को छोड़कर बिलासपुर के शुभम दीक्षित ने गांव में ही किया ये काम, ​लाखों में हो रही कमाई

Bilaspur News: अमेरिका में अच्छी नौकरी और लाखों रुपए के पैकेज वाला करियर छोडकऱ बिलासपुर के शुभम दीक्षित ने गांव में खेती—किसानी का काम शुरू किया और आज लाखों में कमाई कर रहा है..
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बिलासपुर

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Chandu Nirmalkar

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Updated: 2 Sep 2026, 4:00 PM IST

Chhattisgarh News, Bilaspur news,

फूलों की खेती के बीच बिलासपुर के शुभम दीक्षित ( Photo - Patrika )

Chhattisgarh News: बेहतर नौकरी और बड़े पैकेज की तलाश में आज बड़ी संख्या में युवा विदेश का रुख कर रहे हैं। लेकिन बिलासपुर जिले के तखतपुर ब्लॉक के बिनौरी गांव के शुभम दीक्षित ने इसके ठीक उलट रास्ता चुना। अमेरिका में अच्छी नौकरी और लाखों रुपए के पैकेज वाला करियर छोडकऱ वे गांव लौटे और खेती को अपना नया करियर बना लिया। शुरुआत में उन्हें नुकसान भी उठाना पड़ा, लेकिन उन्होंने इसे नाकामी नहीं माना। आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रबंधन के साथ फूलों की खेती शुरू की और आज उनकी मेहनत रंग ला रही है।

शुभम की कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने विदेश में मिले अवसर को छोडकऱ गांव में अपना रास्ता बनाया। जिस खेती को अक्सर युवा रोजगार का अंतिम विकल्प मानते हैं, उसी को उन्होंने तकनीक, निवेश और बाजार की समझ के साथ अपना व्यवसाय कुछ नया प्रयोग मानकर शुरू किया।

Bilaspur News: नया करने का प्रयोग

उनकी 14 एकड़ जमीन में से करीब 5 एकड़ में फूलों की खेती हो रही है। इससे हर महीने करीब 2 से ढाई लाख रुपए तक की आय हो रही है। सालाना आय 24 से 26 लाख रुपए तक पहुंच गई है। उनके खेत में फूलों की खेती के साथ सब्जियों का उत्पादन भी किया जा रहा है। उनके इस प्रयास से आसपास के करीब दर्जनभर लोगों को नियमित रोजगार मिल रहा है।

वर्क फ्रॉम होम ने बदली जिंदगी की दिशा

शुभम ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद अमेरिका में नामी कंपनियों में काम किया। इसके बाद उन्हें वहां बैंक में नौकरी मिली। अच्छी सैलरी, सुविधाएं और सुरक्षित भविष्य होने के बावजूद कोविड के दौरान वर्क फ्रॉम होम ने उन्हें अपने भविष्य को नए सिरे से सोचने का मौका दिया। उन्होंने तय किया कि यदि घर से ही काम करना है और मेहनत करनी ही है तो क्यों न अपने गांव लौटकर कुछ ऐसा किया जाए, जिससे खुद के साथ दूसरे लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर पैदा हों। इसी सोच के साथ उन्होंने अमेरिका छोडकऱ बिनौरी लौटने का फैसला किया।

केले की खेती में नुकसान, फिर फूलों ने बदली तस्वीर

गांव लौटने के बाद शुभम ने खेती की शुरुआत केले के पौधों से की, लेकिन शुरुआती प्रयोग में उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। सबक लेकर उन्होंने खेती छोडऩे के बजाय इसकी बारीकियों को समझना शुरू किया। बाजार की मांग, उत्पादन तकनीक और फसल प्रबंधन का अध्ययन करने के बाद उन्होंने फूलों की खेती का रुख किया। उन्होंने पॉलीहाउस तकनीक अपनाकर रजनीगंधा, जरबेरा, ग्लेडियस और सेवंती जैसे फूलों का उत्पादन शुरू किया। तकनीक के इस्तेमाल से गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में सुधार हुआ। अब खेत में सब्जियों का उत्पादन भी किया जा रहा है।

रजनीगंधा की 70 हजार पौध, जरबेरा की रोज 500 स्टिक

शुभम के खेत में रजनीगंधा के करीब 70 हजार पौधे हैं, जिनसे हर महीने लगभग 80 हजार स्टिक का उत्पादन होता है। वहीं जरबेरा से रोजाना करीब 500 स्टिक फूल निकलते हैं। स्थानीय बाजार के साथ आसपास के क्षेत्रों में भी इनकी मांग रहती है। खेती के इस मॉडल को तैयार करने में शुभम ने लाखों रुपए का निवेश किया है। इसमें लगभग आधी राशि सरकारी सब्सिडी और बाकी बैंक लोन के माध्यम से जुटाई गई। उनका मानना है कि सरकारी योजनाओं, तकनीक और बाजार की सही समझ के साथ खेती को बेहतर व्यवसाय में बदला जा सकता है। खेती में वे रासायनिक खादों का इस्तेमाल कम से कम करने पर जोर देते हैं। वे वर्मी कंपोस्ट और अन्य जैविक खादों का उपयोग कर मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।