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VIDEO STORY : बिलासपुर का इतिहास बयां करने वाली बावली है गुमसुम, यहां अंग्रेज भी मत्था टेककर बढ़ते थे आगे

पत्रिका ने बावली कुआं से जुड़े कुछ अनछुए पहलुओं को जानने की शुरुआत बावली कुएं से ही की।

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Bawali

VIDEO STORY : बिलासपुर का इतिहास बयां करने वाली बावली है गुमसुम, यहां अंग्रेज भी मत्था टेककर बढ़ते थे आगे

बिलासपुर. दादा-दादी से सुनी जाने वाली रानी-राजा और हाथी-घोड़े के किस्से-कहानियां हमेशा आकर्षित करती हैं। हर बार बिल्कुल नयापन लिए। बार-बार सुनने-पढऩे की उत्सुकता रहती है। बिलासपुर के गोलबाजार से गांधी चौक के बीच जवाली नाले के निकट बनी बावली की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। न जाने कितने सालों से इस बावली कुएं से जुड़ी कहानियां लोगों के जेहन में बसी हैं पर जब भी इस रहस्यमयी कुंए की बात करिए तो बताने और सुनने वाले दोनों की आंखों में चमक आ जाती है। शायद कुछ नया सुनने को मिले। पत्रिका ने बावली कुआं से जुड़े कुछ अनछुए पहलुओं को जानने की शुरुआत बावली कुएं से ही की। इस कुएं की वर्तमान तस्वीर यह है कि इसे नगर निगम ने ग्रिल लगाकर ढक दिया और फिर भी पड़ोसी लोग कचरा और कुछ धार्मिक प्रवृत्ति के लोग फूल व पूजा की निष्प्रयोज्य सामग्री यहां डंप करने लगे। यह कचरा कभी भी देखा जा सकता है।

कुएं पर पटरे बिछाए गए हैं और गणेशोत्सव के वक्त यहां गणपति विराजते हैं। तो मोहर्रम के समय भी समुदाय विशेष के लोग यहां आते हैं। आप कह सकते हैं कि साम्प्रदायिक सद्भाव की एक बड़ी मिसाल है। कुएं के ठीक पीछे पिछले 12 साल से चाय की दुकान चलाने वाले जय तो इस बात पर खुश है कि उसे चाय दुकान के लिए छोटी सी जगह मिल गई लेकिन बावली की बदहाली से उसका कोई सरोकार नहीं है। जय ने अपने पुरखों से सुना है कि बावली बहुत गहरी है और इसमें सुरंग जैसी है जो रतनपुर तक जाती है और इसमें राज परिवार की महिलाएं नहाने के लिए इसका पानी उपयोग करते हैं। राजा लोग हाथी पर आते थे और रानियां पालकियों में। कुछ और रोचक जानकारियां मिलीं, इस बावली का निर्माण कराने वाले शेष परिवार के वरिष्ठ सदस्य डॉ. गोपाल शेष से। शेष अब रिटायर्ड हैं और बिलासपुर की कला, संस्कृति और इतिहास की चीजों में दिलचस्पी रखते हंै।