
अरुण तिवारी ने लिखा जज्बाती पत्र, कहा-शैलेश को मेरी जरुरत नहीं...
सेठ तो ग्यो...ये नारा कांग्रेस का अधिकृत नारा नहीं था ये मेरी अपनी रणनीति थी कि मारवाड़ी समाज में परम्परागत रूप से कहे जाने वाले रोजमर्रा के शब्द को हंसी-मजाक में अमर अग्रवाल को घेरने में इस्तेमाल किया जाये, पर जनता ने एवं मेरी मेहनत ने इस नारे को छह महीने में ही ऐसा लोकप्रिय बना दिया कि ये नारा ब्रम्हास्त्र सा बन गया।
बाद में कई लोगों ने इसे अमर के प्रति मेरा दुराग्रह दुर्भावना बताने की कोशिश भी की। अब ज़ब मैं उस चुनावी महाभारत से दूर बहुत दूर कर्ण के समान तडफ़ रहा हूं मेरा पैसा बर्बाद , मेरी मेहनत बर्बाद, अमर से मनमुटाव अलग तब मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं ही गलत था बहुत गलत।
अब इस मोड़ पर मेरी आत्मा असहनीय पीड़ा से गुजऱ रही है। मैं ये सोच सोच कर परेशान हूं कि शैलेश को तो मेरी ज़रूरत है ही नहीं तो क्यों न मैं अपने नारे को भी वापिस ले लूं। मैं जानता हूं कि जब ये पत्र आप तक पहुंचेगा तो लोग चर्चा करेंगें। अरे गुरु अरुण तिवारी तो अमर से सेट हो गया तो चलो आप ही सही मैं सेट हो गया।
ये नारा अब मेरे लिए निर्रथक हो गया। मैं अमर से कहना चाहता हूं ये एक राजनितिक प्रहार था अब मैदान में मैं नहीं हूं अत: मेरा नारा भी नहीं।हालांकि नारा वापिस लेने से कोई फर्क नहीं पडऩे वाला फिर भी ऐसा गैरकांग्रेसी नारा किस काम का बस मेरा वोट कांग्रेस को।मेरा वोट हाथ को। आप सब समझ ले, शैलेश मेरी मदद चाहता ही नहीं।वो सोचता है ब्राम्हण हूं तो मदद करना ज़रूरी है, वो सोचता है कांग्रेसी हूं तो सपोर्ट करना मेरी मज़बूरी है, तो मेरा साफ कहना है मेरा वोट कांग्रेसी है और रहेगा पर सपोर्ट मज़बूरी नहीं।
-अरुण तिवारी
Updated on:
18 Nov 2018 12:56 pm
Published on:
18 Nov 2018 12:49 pm
