
mehboob khan death anniversary unknown facts and personal life
फिल्म निर्देशक महबूब खान का जन्म 9 सितंबर, 1907 को गुजरात के बिलिमोड़ा शहर में हुआ था। 28 मई 1964 को महबूब खान का निधन हो गया था। महबूब खान की आज 68वीं पुण्यतिथि है। अपनी अद्भुत कला के माध्यम से उन्होंने भारतीय सिनेमा का परिचय विदेश तक करवाया, लेकिन ये इतना आसान नहीं था इस मुकाम तक आने के लिए उन्होंने काफी संघर्ष किया।
अक्सर ऐसा होता है कि हम ख्वाब तो कुछ और देखते हैं, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर होता है। आसा ही कुछ हुआ था निर्देशक महबूब खान के साथ। कम ही लोग जानते हैं कि महबूब खान निर्देशक नहीं बल्कि एक्टर बनने का ख्वाब रखते थे। 16 साल की उम्र में ही वे घर से भागकर अपनी किस्मत आजमाने मुंबई आ गये थे। उनके पिता को जैसे ही इस बारे में पता चला तो वे उन्हें वापस घर ले आये, लेकिन अभी भी उनके अंदर ये सपना जिंदा था।
महबूब दोबारा ऐसी हरकत न करें इसके लिए उनके पिता ने एक बेहद छोटी लड़की से कम उम्र में ही उनकी शादी करवा दी। उन्होंने घुटने टेक दिए और शादी कर ली। कुछ समय पश्चात अपने ही शहर में उनकी मुलाकात एक व्यक्ति नूर मोहम्मद से हुई। नूर मोहम्मद ने महबूब को अस्तबल में घोड़े की नाल ठोकने का काम ऑफर किया। दरअसल में नूर मोहम्मद हिंदी सिनेमा के प्रोड्यूसर और फिल्मों में घोड़ा सप्लाई करने का काम करते थे, जिसके चलते महबूब दिमाग में कुछ सूझा और उन्होंने इसके लिए हांमी भर दी और जेब में 3 रुपए लेकर मुंबई के लिए निकल गए।
उस समय महबूब खान 23 वर्ष के थे। एक दिन घोड़े की नाल ठीक करने वाले महबूब खान का साउथ फिल्म की शूटिंग के सेट पर जाना हुआ, बस यहीं वो दिन था जहां से मबूब की किस्मत बदलने वाली थी।
इस फिल्म का निर्देशन चंद्रशेखर कर रहे थे। यहां रुककर उन्होंने फिल्में बनने का पूरा प्रोसेस देखा और डायरेक्टर से कहा कि वह उनके साथ काम करना चाहते हैं। चंद्रशेखर ने उन्हें फिल्म में एक छोटी सी भूमिका दे दी और इसके बाद शुरू हुआ महबूब खान का एक्टिंग करियर।
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महबूब खान ने मेरी जान और दिलवर जैसी कुछ फिल्मों में अभिनय किया। लेकिन उन्हें पहचान मिली निर्माता-निर्देशक के तौर पर। 1935 में महबूब खान को फिल्म अल हिलाल का निर्देशन का मौका मिला जो अरब और रोम के बीच युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित थी, यह फिल्म दर्शकों को खूब पसंद आई। इसके बाद महबूब खान ने आन, अंदाज, अनमोल घड़ी, औरत, अमर, तकदीर, अनोखी अदा और रोटी जैसी शानदार फ़िल्में निर्देशित व निर्मित कीं, लेकिन जिस फिल्म ने उन्हें बुलंदि पर पहुंचाया वो थी साल 1957 में आई फिल्म मदर इंडिया। इस फिल्म ने ऑस्कर की रेस में अपनी जगह बनाई थी। हालांकि फिल्म ऑस्कर अवार्ड तो नहीं जीत पाई थी, लेकिन इसने भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दिखाई थी।
Published on:
28 May 2022 01:25 pm
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