एक दिन वह एक संत के सत्संग में पहुंचा। संत कह रहे थे- दुनिया में किसी के बिना किसी का काम नहीं रुकता। यह अभिमान व्यर्थ है कि मेरे बिना परिवार या समाज ठहर जाएगा। सभी को अपने भाग्य के अनुसार प्राप्त होता है। सत्संग समाप्त होने के बाद मुखिया ने संत से कहा- मैं दिन भर कमाकर जो पैसे लाता हूं, उसी से मेरे घर का खर्च चलता है। मेरे बिना तो मेरे परिवार के लोग भूखे मर जाएंगे।” संत बोले, यह तुम्हारा भ्रम है। हर कोई अपने भाग्य का खाता है। इस पर मुखिया ने कहा, आप इसे प्रमाणित करके दिखाइए। संत ने कहा, ठीक है। तुम बिना किसी को बताए घर से एक महीने के लिए गायब हो जाओ। उसने ऐसा ही किया। संत ने मुखिया को लेकर यह बात फैला दी कि उसे बाघ ने अपना भोजन बना लिया है।