
प्रचार प्रसार
बूंदी. निकाय चुनाव में महिला आरक्षण ने भले ही राजनीतिक मैदान में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई हो, लेकिन चुनाव प्रचार की तस्वीर अब भी काफी हद तक पुरुषों के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है। कई वार्डों में प्रत्याशी महिला हैं, लेकिन प्रचार की कमान उनके पति, बेटे, ससुर और जेठ के हाथ में है। सुबह से शाम तक घर-घर दस्तक, मतदाताओं से संपर्क, समर्थकों की बैठक और चुनावी रणनीति तय करने का जिम्मा परिवार के पुरुष सदस्य ही संभाल रहे हैं। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि चुनावी मैदान में चेहरा भले महिला का हो, लेकिन फैसलों और प्रचार की बागडोर किसके हाथ में रहेगी।
महिला प्रत्याशियों के परिजन वार्ड में छोटी-छोटी टोलियां बनाकर मतदाताओं तक पहुंच रहे हैं। रिश्तेदारी और पुराने संपर्कों का हवाला देकर वोट की अपील की जा रही है। कहीं पति आगे चलकर मतदाताओं से संवाद कर रहे हैं तो कहीं बेटे और जेठ समर्थकों को साथ लेकर जनसंपर्क में जुटे हैं। ससुर भी उम्र और पुराने सामाजिक संपर्कों का फायदा उठाकर मतदाताओं के बीच पहुंच बना रहे हैं। महिला प्रत्याशी कई जगह साथ रहती हैं, लेकिन बातचीत और चुनावी प्रबंधन में पुरुष सदस्य अधिक सक्रिय नजर आते हैं।
हालांकि अंतिम फैसला मतदाताओं के हाथ में है। मतदाता यह भी देख रहे हैं कि प्रत्याशी स्वयं कितनी सक्रिय हैं और वार्ड की समस्याओं को लेकर उनकी समझ और प्राथमिकताएं क्या हैं। चुनाव परिणाम यह बताएंगे कि मतदाताओं ने परिवार के प्रभाव को तरजीह दी या प्रत्याशी की व्यक्तिगत सक्रियता और छवि को। फिलहाल वार्डों में महिला प्रत्याशियों के नाम के साथ उनके परिवार के पुरुष सदस्यों की सक्रियता चुनावी चर्चा का प्रमुख विषय बनी हुई है।
इन चुनावों में पारिवारिक नेटवर्क भी अहम भूमिका निभा रहा है। पति या बेटे का राजनीतिक-सामाजिक संपर्क, ससुर की पुरानी पहचान और जेठ की क्षेत्र में पकड़ को महिला प्रत्याशी की ताकत के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। कई वार्डों में मतदाताओं के बीच प्रत्याशी से ज्यादा उसके परिवार की पहचान चर्चा में है। ऐसे में चुनाव सिर्फ प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि का मुकाबला नहीं रहकर परिवार की प्रतिष्ठा और प्रभाव का भी मुकाबला बनता जा रहा है।
निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों ने राजनीति में महिलाओं के प्रवेश का रास्ता जरूर खोला है। बड़ी संख्या में महिलाएं चुनाव मैदान में उतरी हैं। इससे वार्ड स्तर पर महिला नेतृत्व को अवसर मिलने की उम्मीद जगी है, लेकिन कई प्रत्याशियों के मामले में चुनाव प्रचार और रणनीति की जिम्मेदारी पुरुष परिजनों के हाथ में रहने से यह बहस भी तेज हो गई है कि आरक्षण से केवल प्रतिनिधित्व बढ़ रहा है या वास्तव में निर्णय लेने की भूमिका भी महिलाओं के हाथ आ रही है। वार्ड 26 से आशा वैष्णव कांग्रेस प्रत्याशी हैं। उन्होंने घर-परिवार की जिम्मेदारियों से कुछ समय निकाल कर अब जनसेवा का निर्णय किया है। चुनाव प्रचार की कमान पति के साथ-साथ उनकी सास, भाभी और साली घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क कर रही हैं। परिवार एकजुट होकर जन समर्थन जुटाने में लगा हुआ है।
वार्ड 46 से आशा गंगवाल कांग्रेस चुनावी मैदान में उतरने के साथ प्रचार-प्रसार में उनके परिजन सक्रिय रूप से जुटे हैं। देवरानी, बहू और भाभी घर-घर जाकर मतदाताओं से वोट मांग रही हैं। ये महिलाएं सूर्योदय के साथ ही प्रचार अभियान में शामिल हो जाती हैं और देर शाम तक मतदाताओं से संपर्क करती हैं। इनके साथ महिला मंडल भी जुटा हुआ है।
वार्ड 50 से प्रियंका मूंदड़ा भाजपा से उम्मीदवार है। प्रचार में उनके परिवार के सदस्य और दोस्त सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनकी सास, मां और भाभी घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क कर रही हैं। दोस्तों का समूह भी प्रचार अभियान में उनका सहयोग कर रहा है। क्षेत्र में नयापन लाने और जन समस्याओं के समाधान का संकल्प किया है।
वार्ड 51 से भाजपा से उमा जांगिड़ से कांग्रेस से कैलाश बाई चुनाव मैदान में है। दोनों परिवार केे सदस्यों के साथ रिश्तेदार भी मतदाताओं से सम्पर्क में जुटे हुए है। साथ ही शाम को चुनाव कार्यालस पर आकर दिन भर की गतिविधियों की समीक्षा भी कर रहे है।
Updated on:
8 Sep 2026, 12:23 PM IST
Published on:
8 Sep 2026, 12:22 PM IST
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