
अनदेखी से वैभव खो रहे ऐतिहासिक स्थल
जजावर. राष्ट्रीय राजमार्ग 148 डी से सटा जजावर कस्बा अपनी प्राकृतिक सुंदरता व पौराणिक विरासत से अटा हुआ है। यहां के लोगों की आजीविका के प्रमुख साधन की बात की जाए तो 90 प्रतिशत से अधिक आबादी के लोग कृषि व पशुपालन पर निर्भर है। वहीं कस्बे की जनसंख्या करीब दस हजार एक सौ बाइस के करीब है।
यह है गांव का इतिहास
सर्वप्रथम राव समर सिंह (1244-1275) के पुत्र हरपाल सिंह को जागीरी प्रधान की। यह जजावर ग्राम नगर नैनवां के समीप एक महत्वपूर्ण चेक पोस्ट हुआ करती थी। राव रतन के पुत्र गोपीनाथ थे। गोपी नाथ के 12 पुत्रों में से महासिंह एक थे। उन्हीं के वंशज महाराजा अक्षयराज इस जागीर के अधिपति थे। उनके पिता महाराज बैरीशाल थे। उनकी मृत्यु पर विक्रम संवत 1976 कार्तिक (नवम्बर 1919 ई.) इस जागीर के मालिक बने। यह जागीर सन 1571 में राव भोज के समय स्थापित हुई। जागीर की आय 6500 रुपए प्रतिवर्ष थी। तारागढ़ किले के प्रशासन को 45 पैदल सिपाही यहां भेजना अनिवार्य था। बदले में जागीरदार को राज्य में 422 रुपए जमा करवाने होते थे।
यहां के प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल
झैठाल माताजी का मंदिर का निर्माण सन् 1632 ई. में जजावर ठिकानेदार रघुवीर सिंह के समय में हुआ था। मूर्ति स्थापना के समय यहां मल सिंह व मल्लोप सिंह का शासन था। यहां के प्रथम पुजारी धुधा लाल थे। इनके वंशज (भोपा) आज भी झैठाल माताजी की पूजा-अर्चना करते हैं।
बालाजी की बावड़ी व गणेशजी महाराज का कुंड
हाड़ा वंश के राजा मालदेव की पत्नी रानी बदन कंवर ने विक्रम सं. 1661-62 पहले बावड़ी व उसके उपरान्त कुण्ड का निर्माण करवाया था। कुण्ड निर्माण के दौरान एक ही खान का पत्थर प्रयोग में लिया था। प्राचीन समय में कुंड ही पेयजल का मुख्य स्रोत था। बालाजी की बावड़ी की लंबाई 60 फीट, चौड़ाई 18 फीट व गहराई 60 फीट, सीढिय़ों की संख्या 50 है। वहीं गणेशजी महाराज का कुंड की लंबाई 40 फीट, चौड़ाई 40 फीट व गहराई 60 फीट ,सीढिय़ों की संख्या 60 है।
भूखी चावंड का शिव मंदिर
भूखी चावंड का शिव मंदिर प्राचीन कलात्मकता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस मंदिर के बारे में ऐसी किवंदति है कि 'जहां छाया वहां माया' जिसके चलते असामाजिक तत्वों ने जगह जगह इसको खोद रखा है।
हालांकि मंदिर निर्माण के समय का पता नहीं चल पाया है। बुजुर्गों के अनुसार पहले जजावर की बसावट मंदिर के आसपास ही थी। जिसके साक्ष्य आज भी खुदाई में मिल जाते हैं। यह सब्जी मंडी की तरह सब्जी बेची जाती थी। भूखी चावंड के शिव मंदिर के सामने की दिशा में कई शिवलिंग मौजूद है। लोगों ने बताया कि पुरातत्व विभाग को इसकी मरम्मत करवानी चाहिए। ताकि प्राचीन विरासत जीवित रहे।
यह होती है यहां फसलें
यों तो जजावर कस्बे में सभी जातियों का समावेश है, लेकिन माली, धाकड़, गुर्जर जाति की यहां बहुलता है। जिनका आजीविका का साधन खेती है। आज के दो दशक पहले यहां गन्ने की खेती के लिए विशेष पहचान थी, जो वर्तमान समय में सिमटकर रह गई। गेहंू, मक्का, ज्वार, बाजरा, सरसों, चना आदि की फसलों की खेती प्रमुखता से की जाती है।
Published on:
31 May 2021 05:38 pm
