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Bundi News : छोटीकाशी की रामलीला में अपने ही कलाकारों का वनवास

वह भी एक समय था, जब आजाद पार्क में रामलीला शुरू होने से 3 घंटे पहले ही दरी-चटाई लेकर दर्शक जम जाते थे। स्टेट के जमाने में भगवान श्रीराम हाथी पर सवार होकर रावण वध के लिए जाते थे, राजमाता खुद रावले की खिडक़ी से रामलीला देखती थी और भरत-मिलाप का गवाह बनता था बुलबुल का चबूतरा, लेकिन डिजिटल युग में अब छोटीकाशी बूंदी की ऐतिहासिक रामलीला महज औपचारिकता बनकर रह गई है।
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exile of its own artists in ramlila

बूंदी मंडल के कलाकारों द्वारा 4 वर्ष पूर्व रामलीला के मंचन का नजारा।

बूंदी. वह भी एक समय था, जब आजाद पार्क में रामलीला शुरू होने से 3 घंटे पहले ही दरी-चटाई लेकर दर्शक जम जाते थे। स्टेट के जमाने में भगवान श्रीराम हाथी पर सवार होकर रावण वध के लिए जाते थे, राजमाता खुद रावले की खिडक़ी से रामलीला देखती थी और भरत-मिलाप का गवाह बनता था बुलबुल का चबूतरा, लेकिन डिजिटल युग में अब छोटीकाशी बूंदी की ऐतिहासिक रामलीला महज औपचारिकता बनकर रह गई है। शारदीय नवरात्र में आजाद पार्क में रामलीला मंचन हो रहा है, लेकिन इस बार भी बूंदी के कलाकार नहीं, नागौर की मंडली को मौका दिया गया है। शहर का एकमात्र कला मंडल श्री वीरभद्र रामलीला मंडल 1964-65 से लगातार रामलीला करता आ रहा है।

शुरुआत नाहर का चौहट्टा स्थित बुलबुल के चबूतरे से हुई, 1969 से आजाद पार्क इसका साक्षी बना। पंडित बृजसुंदर शर्मा ने इसके आयोजन का जिम्मा नगर पालिका को सौंपा था। वर्तमान मंडल अध्यक्ष महेश श्रृंगी बताते हैं कि हर वर्ष टेंडर डालने के बावजूद पिछले 4 वर्षों से स्थानीय मंडल को अपने ही घर में मंचन का अवसर नहीं मिल रहा है। उनका कहना है कि यह हमारा पेशा नहीं शौक और जुनून है। साल भर रिहर्सल करते हैं। अगर हर साल बाहर की मंडली को ही मौका मिलेगा तो नए कलाकार नहीं जुड़ेंगे और 62 साल पुरानी परंपरा दम तोड़ देगी। जबकि बाहरी मंडलियों की तुलना में आज भी बूंदी के कलाकारों को देखने अधिक भीड़ आती है।

50 साल से पुरुष ही निभा रहे सीता का रोल

इस मंडली की एक खास पहचान यह भी है कि पिछले 50 साल से महिला पात्र का अभिनय भी पुरुष ही कर रहे हैं। कई बार महिला कलाकारों को लाने के सुझाव आए, पर परंपरा नहीं तोड़ी गई। रामलीला मंचन आजाद पार्क में होता है और भरत-मिलाप आज भी उसी बुलबुल के चबूतरे पर होता है, जहां से 1964 में इसकी शुरुआत हुई थी। धार्मिक नगरी में रामलीला शुरू कराने के लिए राजमाता श्यामराज कंवर ने 25 रुपए देकर प्रेरणा दी थी।

कोई सुनने वाला नहीं

नगर परिषद हर साल टेंडर से रामलीला करवाती है, लेकिन सवाल यह है कि जब बूंदी का अपना 62 साल पुराना, मंडल मौजूद है, जिसने बूंदी के बाहर भी नाम कमाया है, तो उसे 4 साल से लगातार नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है? यदि समय रहते स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन नहीं मिला, तो छोटी काशी की यह सांस्कृतिक विरासत केवल किस्सों में रह जाएगी, जबकि मंच पर नागौर, मथुरा की मंडलियां ही दिखेगी।

चौपाइयों से होता था संवाद

बूंदी की रामलीला के इतिहास के कई रोचक किस्से हैं। स्टेट के समय में कलाकार पूरे चौपाई-दोहे और संवाद के साथ अभिनय करते थे। बूंदी की राजकुमारी महेंद्र कुमारी भगवान राम के राज्याभिषेक की साक्षी बनी। उस दौर में भगवान राम हाथी पर सवार होकर रावण वध को जाते थे, जबकि अन्य पात्र घोड़े-बग्घियों में आते थे। रावण दहन तब लंकागेट पर होता था और पात्र राजा-महाराजाओं की असली ड्रेस पहनते थे। पहली रामलीला में राम-सीता का अभिनय जमनालाल धाभाई और राम-लक्ष्मण ने किया था, रावण बने थे जंगम की बगीची के महंत बाबा चमन गिरी महाराज, जो राजा दशरथ भी बनते थे। राम बने पात्र अब तक 18 बार रावण वध कर चुके हैं।