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कभी थी विदेशों में धाक, अब खेतों से गायब हुई खुशबू

बासमती चावल जिसकी महक दूर से ही आकर्षित करती थी, जिसने बूंदी को विशिष्ट पहचान दिलाई, आज वो बासमती इतिहास बनकर रह गया।
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बूंदी

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pankaj joshi

Apr 22, 2019

kabhee thee videshon mein dhaak, ab kheton se gaayab huee khushaboo

कभी थी विदेशों में धाक, अब खेतों से गायब हुई खुशबू

एक दशक से घटा रुझान, अब उत्पादन बंद : अधिक मुनाफे के पीछे दौड़ रहे किसान
बूंदी. बासमती चावल जिसकी महक दूर से ही आकर्षित करती थी, जिसने बूंदी को विशिष्ट पहचान दिलाई, आज वो बासमती इतिहास बनकर रह गया। अब तलाशने से भी बूंदी का देशी बासमती नहीं मिलता। जी हां! देशी बासमती चावल की किस्म को लुप्त हुए एक दशक होने को आया। इसके साथ ही बासमती की महक भी गायब हो गई, लेकिन लोगों की जुबान से आज भी बासमती का नाम गायब नहीं हो रहा। बाजार में लोग बासमती के नाम से ही चावल मांग रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि बाजार में लोगों को अन्य किस्मों का चावल खरीदना पड़ रहा है।
बासमती चावल का स्वाद व महक इन किस्मों में देखने को नहीं मिलती। अब किसान अधिक उपज लेने के चक्कर में इस फसल को नहीं करते।
2004 से हुई थी शुरुआत
एक दशक पहले बूंदी की मंडियों में बासमती चावल सर्वाधिक मात्रा में आता था। मंडियां इस चावल से अटी रहती थी, लेकिन वर्ष 2004 में धान की 1121 किस्म की शुरुआत हुई। इसके आने के बाद से धीरे-धीरे देशी बासमती लुप्त होता चला गया। अब बासमती चावल कहीं देखने को नहीं मिलता। अधिकतर किसान अब 1121 किस्म ही कर रहे हैं। यह विश्व का सबसे लंबा चावल है।
उत्पादकता है अधिक
कोटा-बूंदी सहित अन्य मंडियों में वर्तमान में धान की कुछ किस्में चल रही है। जिनमें 1121(पूसा फोर), पूसा 1509, पूसा वन, सुगंधा शामल है। बीते कई वर्षों से किसान बासमती को छोडक़र इन किस्मों का उत्पादन कर रहा है। इसका मुख्य कारण उत्पादन अधिक होना माना जा रहा है। इन सभी किस्मों का उत्पादन बासमती से अधिक होता है।
नहीं मिलता वो लजीजपन
बासमती चावल जैसी महक बाजार में बिक रहे चावल में नहीं आती। बासमती चावल की महक व मीठापन आज कहीं नहीं मिलता। देशी बासमती चावल जैसा स्वाद भी किसी भी चावल में नहीं आता। यही कारण है कि बासमती चावल जैसा लजीजपन भी खत्म हो गया है।
देशी बासमती चावल को लुप्त हुए करीब एक दशक हो गया है। कोई इक्का-दुक्का किसान थोड़ा बहुत पैदा करते हों तो बात अलग है, लेकिन वर्तमान में 1121 (पूसा-4) सहित अन्य किस्में बाजार में चल रही है। किसान को अधिक उपज मिलने से वो बासमती को छोडक़र अन्य किस्मों को करना पसंद करने लग गया। बासमती चावल जैसी महक व स्वाद बाजार में आ रहे चावलों में नहीं मिलता।
राजेश तापडिय़ा, अध्यक्ष श्रीचावल उद्योग संघ, बूंदी