गोपालजी को रंग इतने प्रिय थे कि कहा जाता था कि...छूटे न रंग ऐसी रंग दे चुनरिया धोबनियां धोए चाहे सारी उमरिया...सोने चांदी की पिचकारियों से रंगो की बौछार देखते ही बनती थी। पंडित मधुसूदन शर्मा बताते है कि समय के साथ अब सब कुछ बदल गया। गुलाल और अबीर, फूलों से होली खेलते है। परम्परा को कायम करते हुए बसंती पंचमी से फूल डोल यानि 37 दिनों तक यहां होली की धूम रहती है प्रतिदिन सुबह मंगलाआरती और प्रसादी का वितरण किया जाता है। बड़ी संख्या में महिलाए विदेश प्रर्यटक होली का आनंद लेते है।