
बूंदी. गरीब व कमजोर वर्ग की ईद की खुशियां फीकी न हो इसके लिए अब समुदाय के लोग मिलकर हाथ बढ़ाने लगे है। इस्लाम के बुनियादी फ़र्जो में से एक जकात अदा करने का सिलसिला रमजान माह में शुरू हो जाता है, ताकि ईद की खुशियां हर तरफ बरस सके।
रमजान का महीना दुनियाभर के मुसलमानों के लिए अदब और अकीदत का महिना है। यह महीना कई मायने में इंसान को बेहतर बनाता है। उसकी खामियों का जहां पता चलता है, वहीं खूबियों को बढ़ाने का मोका मिलता है। इस महीने में रोजेदार कमजोर लोगो की मदद करते है।
जकात-दान के जरिए ये मदद की जाती है। मौलाना असलम बताते है कि मजहबी दायरे से निकलकर देखा जाए तो रमजान इंसान को इंसान बनाने का बेहतर महीना है। बुराईयों से दूर ओर अच्छाईयों के नजदीक ले जाने की इस महीने में इबादत होती है।
जहां लोग इफ्तार के जरीए भाईचारे को बढ़ावा देते है, वहीं जकात से कमजोर लोगो की मदद की जाती है। आमतौर पर ईद से पहले जकात निकाली जाती है। कमाई का कुछ अंश दिया जाता है। इससे सवाब-पुण्य का दायरा भी 70 गुना अधिक हो जाता है। ढाई फीसदी जकात देकर मुसलमान अपनी जान-माल की हिफाजत कर सकते है।
कहते है कि जिस व्यक्ति के पास 7.50 तोला सोना ओर 52.50 तोला चांदी है वह जकात देने का हकदार होता है। शरीयत के मुताबिक जकात उस पर फर्ज होती है जो 87 ग्राम सोना या 612 ग्राम चांदी का मालिक हो या फिर सोना-चांदी दोनों को मिलाकर किसी एक, 87 ग्राम सोना या 612 ग्राम चांदी के बराबर संपत्ति का मालिक हो।
जकात का मतलब दान है, बस इसको देने और लेने का तरीका इस्तेमाल करने के कायदे और देने-लेने का वक्त और कितना दिया जाएगा यह तय है। अब्दुल शकुर कादरी बताते है कि कुरआन में जकात का आपकी आय के ढाई प्रतिशत पर गरीबों का भी हक है।
जकात से होने वाली आमद से मुफलिसों की मदद होती है, मदरसों में इंतजाम किए जाते हैं। बेसहारा की मदद की शक्ल में भी इसका इस्तेमाल होता है।
यह भी कर सकते हैं
गरीब लड़कियों की शादी में मदद, बेसहारा बेवा औरतों को मदद, गरीब गर्भवती महिलाओं की मदद, गरीब मरीजों के इलाज के लिए मदद, गरीब बच्चों की स्कूल की फीसमें मदद, मोहल्ले-पड़ोस के गरीब लोगों की जरूरत पूरी कर सकते हैं।
इन्हें दे सकते हैं जकात- करीबी रिश्तेदार व गरीबों आस-पडा़ेस।
इन्हें नहीं दे सकते हैं जकात-साहिबे निसाब, माता-पिता, बेटा।
Published on:
02 Jun 2018 03:01 pm
