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Special story: अजूबों की बावड़ी ! सास बड़ी या बहू अब तक कोई नही जान पाया…जानिए क्या है रहस्य….

सास- बहू का किस्सा तो आपने बहुत सुना होगा लेकिन बूंदी जिले के हिंडोली क्षेत्र में सास बहू का किस्सा रौचक ही नही बल्कि रहस्यों से भी भरा है।
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Special story: Bundi District of kalaatmak baavadiya

Special story: अजूबो की बावड़ी ! सास बड़ी या बहू अब तक कोई नही जान पाया...जानिए क्या है रहस्य....

बूंदी. सास- बहू का किस्सा तो आपने बहुत सुना होगा लेकिन बूंदी जिले के हिंडोली क्षेत्र में सास बहू का किस्सा रौचक ही नही बल्कि रहस्यों से भी भरा है। यहां की कलात्क बावडिय़ों के पिछे सास- बहू की किवंदती छूपी हुई है।

ग्राम पंचायत सथुर में चंद्रभागा नदी के किनारे समीप सास-बहू का प्राचीन कुंड को एक दिन में कई कारीगरों द्वारा बनाएं जाने से यह कुंड हमेशा चर्चा में रहे हैं। गांव के बुजुर्ग नारायण पारीक बताते है कि सथूर में एक परिवार में सास बहू रहती थी।

दोनों मां बेटी की तरह आपसी प्रेम था परिवार में दोनो के अलावा कोई सदस्य नही था। आर्थिक रूप से सम्पन्न सास बहू ने मिलकर गांव में कुंड बनाने का निर्णय लिया। ताकि दोनो की यादें सदियों लोगो के दिलों में जिंदा रहें।

कुंड को एक ही दिन में तैयार करना था फिर क्या था कई कारीगर एक जुट होकर कुंड बनाने में लग गए। सुबह से रात हो गई इस बीच सास का कुंड तो बनकर तैयार हो गया लेकिन बहू का कुंड समय के अभाव में पूर्ण नही हो सका। और छोटा ही रह गया। उसी के बाद से इन कुंडो को सास बहू कुंड का नाम दिया गया।

कुंड में स्थापत्य कला की बेजोड़ नमूने इस कुंड में नजर आते है। प्राचीन पत्थर से कलात्मक कंगूरे बने हुए है। बावड़ी के शुरुआत में दोनों और मंदिर है एक में लक्ष्मीनाथ जी दूसरे में शिव की प्रतिमा विराजमान है। एक दशक पूर्व अंतरराष्ट्रीय तस्कर घिया द्वारा लक्ष्मी नाथ जी की प्रतिमा काले पत्थर से बनी हुई थी जिसे चुरा कर ले गया था, जो प्रतिमा जयपुर के विद्याधर नगर थाने में माल खाने में मिली। बहू का कुड छोटा सा है जो मुख्य दरवाजे बना हुआ है। दोनो की कलाकृति एक जैसी है।


रहस्य से कम नही कुंड की सीढियाँ


सास-बहू के इस कुंड की सीढियाँ किसी रहस्य से कम नही। गांव के पन्नालाल धाभाई,बंसी लाल का कहना है कि बहू के कुंड की सीढिय़ां गिनने पर संख्या पूरी नहीं मिलती। इसे अचरज ही कहा जाएगा कि आज तक कोई भी इन सिढिय़ों को पूरा नही गिन पाया है।

नही हो रही संभाल-


प्राचीन कलात्मक कुंड की देखरेख नही होने से अब यह दुर्दशा का शिकार हो रहा है। मंदिर की बनी छतरी भी जर्जर हो गई है उसके मरम्मत की दरकार है। मंदिर की सेवा पूजा करने वाले पंडित ने बताया कि मंदिरों में पूजा अर्चना प्रतिदिन की जाती हैं। लेकिन मंदिरों का व कुंड का रखरखाव नहीं होने से जर्जर स्थिति में आ गए हैं इनके रखरखाव के लिए सरकार और प्रशासन को विशेष ध्यान देना होगा। कुंड के पास चंद्रभागा नदी पर हर की पैड़ी आ बनी हुई है जहां का पानी काफी शीतल है।


हरिद्वार से कम नही यी स्थल-


गांव के पूर्व सरपंच मनमोहन धाबाई ने बताया कि यहां पर भी साफ-सफाई हो जाए और मंदिर की मरम्मत हो जाए तो हरिद्वार के मुकाबले यहां स्थल बन सकता है। पहले इसे सथूर धार्मिक नगरी के नाम से जाना जाता है यहां पर 1 दर्जन से अधिक मंदिर स्थापित है जो कि प्राचीन समय में बने हुए हैं इन मंदिरों का रखरखाव हो जाए तो सतूर पुष्कर से कम नहीं है यहां की चंद्रभागा ,सथूर माता ,महादेव मंदिर का प्रदेश में मुख्य नाम है।