बुरहानपुर. मुगल बादशाहों का दारूसुरूर (खुशी का घर) आज का बुरहानपुर।यहां की जमीन हर समय अपने इतिहास को उगलती है। खुदाई के दौरान मिलने वाले सिक्के, प्राचीन मूर्तियां एवं पुराने महल इसके गवाह है। 300 सालों तक टकसाल (सिक्के तैयार करने का कारखाने) में मुगल बादशाहों से लेकर सिंधिया तक के सिक्केे तैयार हुए। मुगलों के समय सिक्कों का विशेष स्थान रहा। इतिहासकारों के पास यह सिक्केे आज भी सुरक्षित है।
दरअसल ग्राम चौखंडिया स्थित बोरबन तालाब की खुदाई के दौरान पुरातात्विक महत्व के सिक्के कोषालय में जमा होने के बाद प्रशासनिक अफसरों की रुचि में इतिहास और पुरातात्विक महत्व के सामान की तरफ बढ़ गई। लोगों को इतिहास से रूबरू कराने के लिए शहर में बन रहे संग्रहालय में पुराने सिक्कों एवं सामान को सुरक्षित रखा जाएगा। जिसको लेकर प्रशासन की तरफ से प्रयास शुरू कर दिए गए है। संग्रहालय में पुरातात्विक सामान रखने के लिए जो लोग सिक्के एवं सामान देेंगे उन्हे प्रशासन द्वारा समानित किया जाएगा।
विभिन्न नामों से निकाले थे सिक्के
बुरहानपुर टकसाल के सिक्के बहुत ही खूबसूरत होते थे। विशेष पर्व राजा का जन्मदिन, नगर में प्रथम प्रवेश, जंग में फतह के मौके पर नए सिक्के तैयार किए जाते थे। बादशाह जहांगीर, औरंगजेब, शाह आलम सहित अन्य मुगल बादशाहों ने निसार सिक्के निकाले। जहांगीर ने विशेष सिक्का नूर अफसान भी निकाला। औरंगजेब ने बुरहानपुर पर (फकीरा का नगर) नाम से भी सिक्के तैयार कराए। बादशाहों के नाम और तारीख सहित बुरहानपुर और दारूसुरूर लिखा हुआ मिलता है। टकसाल में सोने, चांदी और तांबे के सिक्के भी शामिल हैं। निसार सिक्के निकले, निसार का अर्थ न्योछावर होता है। ये किसी भी शुभ अवसर निकलते है।
पुरातात्विक महत्व के सिक्के, सामान कोषालय में जमा कराएं, ऐसे लोगों को विशेष अवसरों पर समानित किया जाएगा, यह सिक्के, सामान संग्रहालय में रखेंगे।
हर्षसिंह, कलेक्टर, बुरहानपुर