9 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

Seminar- हिंदुस्तान में संस्कृत भाषा से उर्दू भाषा का प्रादुर्भाव

कश्मीर, राजस्थान सहित देशभर से आए उर्दू शोधकर्ताओं ने पढ़े शोधवक्ताओं ने कहा यह किसी एक कौम की जुबान नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्तान की जुबान

2 min read
Google source verification
Seminar

Dr. hadis ansari

बुरहानपुर. सेवा सदन कॉलेज में दो दिवसीय उर्दू विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसका विषय उर्दू शेर और अदब की तरक्की में गैर मुस्लिम का हिस्सा। जहां राजस्थान, कश्मीर, यूपी, बिहार, दिल्ली सहित देशभर से आए उर्दू शोधकर्ताओं ने शोध पढ़े। सभी ने कहा उर्दू गंगा जमुनी तहजीब का संगम है। उदयपुर राजस्थान से आए शोधकर्ता ने कहा उर्दू संस्कृत के पेड़ से निकली उर्दू भाषा का हिंदुस्तान की सरजमी पर जन्म हुआ।

शोधकर्ताओं ने बताया कि उर्दू भाषा समाज को कैसे जोड़ती है, देश को कैसे उन्नति की ओर ले जाया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने कहा कि उर्दू की तरफ जो बेजारी दिखाई जा रही है ऐसा नहीं होना चाहिए। इसी सरजमी पर सभी ने इस जुबान को तरक्की बख्शी, दिल से लगाया। यह जुबानी भाषा हमने खुद ने नहीं बनाई। मां की गोद में बच्चा पैदा हुआ तो वह जुबान लेकर नहीं आया वह उर्दू की गोद में उर्दू सीखता है, तो हिंदी की गोद में हिंदी और संस्कृत की गोद में तो संस्कृत सीखता है।

यह बोले शोधकर्ता
उदयपुर विश्वविद्यालय से आए डॉ. हदीस अंसारी ने कहा कि उर्दू की सबसे बड़ी खूबी यह है कि संस्कृत से निकली है और इसी सरजमी के ऊपर। इसके तत्भव को देख लीजिए, अल्फाज को देख लीजिए, शब्दों को देख लीजिए फार्मेशन को देख लीजिए। संस्कृत में प्राकृत, अभ्रंश और ब्रज भाषा का जो रूप आता है, उसमें खड़ी बोली निकलती है उसी पीरियड में जो आर्य यहां पर आए और संस्कृत को डेवलप किया। एक ग्रुप उनका ईरान की वादियों में चला गया। जब वह दोबारा हिंदुस्तान आए तो यहां संस्कृत, फारसी, अरबी जब इस सरजमी पर तीन भाषाओं का मिलन होता है तो उर्दू उसमें से कोपल की तरह निकलती है और हरदिल अजीज बन जाती है। लोगों को अपने अल्फाज से लोगों के दिलों को मोह लेती है। यही इसकी मकबूलियत का सबब है कि कोर्ट से लेकर घर तक, घर से लेकर बाजार तक हर जगह उर्दू बोली जाती है, लेकिन हम अभी कुछ बोल नहीं सकते, लेकिन जुबानें कभी मरती नहीं हैं। देवनागरी को हम अलग नहीं समझते। दोनों एक ही हैं बस फर्क यह है कि एक उर्दू फारसी के अल्फाबेट से लिखी जाने लगी और एक जगह संस्कृत की तरफ से जो अल्फाबेट डेवलप हुए।

कश्मीर से आए डॉ. आजाद अय्यूब ने कहा कि उर्दू भाषा आल्मी जुबान है और इसको सिसायत कह दीजिए या कुछ मुफाद के लिए लोगों ने किसी एक कौम के लिए एक तपके से इसे जोड़ दिया। इस जुबान की जो अहमियत रही कि इससे गंगा जमुनी तहजीब, जिसका संगम हिंदुस्तान में हुआ है। पहले लोग जो यहां कर गुजरे हैं वो चाहे हिंदू, मुस्लिम सिख हो इसाई हों, उन्होंने इस जुबान को गले से लगाया, लेकिन आज के इस दौर में इसे एक तपके के साथ जोड़ दी गई, लेकिन यह एक जुबान है किसी एक की नहीं है सभी की है। यह बहुत ही मीठी है।

यह भी बोले

लखनऊ यूनिवर्सिटी से आए डॉ. आरिफ अय्यूबी ने कहा कि ये सेमिनार कई माइनों में अच्छा है। भाषा किसी मजहब की जुबान नहीं होती इससे यह साबित होती हे। भाषा सिर्फ अपने कल्चर की भाषा होती है। इस सेमिनार से पूरे देश में एक अच्छा संदेश जाएगा।

सेवा सदन कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. एसएन शकील ने कहा कुछ लोगों ने उर्दू को सिर्फ एक धर्म की जुबान बनाना मकसद है। सेमिनार में इस बात को साबित करने की कोशिश की गई है उर्दू हिंदुस्तान की जुबान है। किसी एक धर्म विशेष किसी एक धर्म जाति की जुबान नहीं है।