
मिडिल ईस्ट में युद्ध के हालात जारी हैं। (PC: AI)
अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच पश्चिम एशिया के देश हथियारों की खरीद में अरबों डॉलर झोंक रहे हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक हथियार आयात में पश्चिम एशिया की हिस्सेदारी 2007-2012 के बीच 8 फीसदी से बढ़कर 2019-2024 में 21.1 फीसदी हो गई है। यानी पिछले दो दशकों में इस क्षेत्र ने दुनिया के बड़े हथियार बाजार का दर्जा हासिल कर लिया है।
इस पूरे कारोबार में सबसे बड़ा फायदा अमेरिका को हो रहा है। SIPRI के आंकड़ों के मुताबिक 2019-2024 के दौरान सऊदी अरब के कुल हथियार आयात का 74 फीसदी हिस्सा अकेले अमेरिका से आया। कुवैत में यह आंकड़ा 64 फीसदी, कतर में 45 फीसदी और UAE में 44 फीसदी रहा। खाड़ी देशों की सुरक्षा जरूरतें अमेरिकी रक्षा उद्योग के लिए एक स्थायी और मुनाफेदार बाजार बन चुकी हैं।
सऊदी अरब अपनी वायुसेना को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है। उसके कुल हथियार आयात का 53 प्रतिशत हिस्सा लड़ाकू विमानों का है। वहीं UAE ने अपनी रणनीति बदल ली है। 2007-2012 में UAE के आयात में विमानों की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत थी, जो 2019-2024 में घटकर महज 14 प्रतिशत रह गई। इसके बजाय UAE ने मिसाइल प्रणालियों पर दांव लगाया है, जिनकी हिस्सेदारी 19 प्रतिशत से उछलकर 46 प्रतिशत पर पहुंच गई।
खाड़ी देश अब सिर्फ आसमान ही नहीं, समुद्र पर भी अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं। नौसैनिक जहाजों की खरीद 2007-2012 के 1.2 प्रतिशत से बढ़कर 2019-2024 में 10 प्रतिशत हो गई है। व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण समुद्री गलियारों की सुरक्षा के लिए यह निवेश लगातार बढ़ रहा है।
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव जब तक कम नहीं होता, तब तक हथियारों का यह कारोबार थमने वाला नहीं है। अमेरिका जैसे देशों के लिए यह क्षेत्र एक ऐसा बाजार बन गया है जहां संकट जितना गहरा होता है, व्यापार उतना ही बढ़ता है।
Updated on:
6 Mar 2026, 11:50 AM IST
Published on:
6 Mar 2026, 10:17 AM IST
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