
two-wheeler loans
भारत में हर महीने लगभग 17 लाख से ज्यादा टू-व्हीलर बिकते हैं, इनमें 30-35 हजार से लेकर 40 लाख से ज्यादा तक की रेंज के वाहन शामिल हैं। देश में करीब 30 फीसदी टू-व्हीलर लोन के माध्यम से ही खरीदे जाते हैं। नोटबंदी के चलते अधिकांश लोग पैसों की कमी से जूझ रहे हैं, वहीं अच्छी लिक्विडिटी के चलते बैंकों से लोन भी आसानी से मिल रहा है। यदि आप भी टू-व्हीलर खरीदने की योजना बना रहे हैं तो लोन के लिए बाजार में कई विकल्प मौजूद हैं। सही विकल्प का चयन करने के लिए आपको कई फैक्टर्स पर गौर करना चाहिए। अच्छी डील के लिए जानिए कुछ जरूरी बातें...
प्रोसेसिंग शुल्क
प्रोसेसिंग फीस या एप्लीकेशन फीस लेंडर की ओर से आपके दस्तावेजों की प्रोसेसिंग के लिए वसूला जाने वाला शुल्क होता है। कुछ बैंकों की प्रोसेसिंग फीस निश्चित होती है, जबकि कुछ टू-व्हीलर के सेग्मेंट और लोन अमाउंट के आधार पर तय करते हैं। ऐसे में इसकी जानकारी लेना बेहद जरूरी है।
एक्स शो-रूम और ऑन रोड कीमतें और लोन की राशि
यह लोन अमाउंट को दर्शाती है, जिसे वाहन के मूल्य के प्रतिशत के तौर पर दिखाया जाता है। उदाहरण के लिए कोई बैंक एक लाख रुपए के वाहन के लिए 80 फीसदी फंडिंग कर रहा है तो इसका मतलब 80 हजार रुपए का लोन जारी हो सकता है। यह आमतौर पर एक्स-शोरूम और ऑन-रोड फंडिंग के आधार पर व्यक्त किया जाता है। ऑन-रोड फंडिंग में बीमा, रोड-टैक्स, रजिस्ट्रेशन आदि शुल्क शामिल होते हैं।
तयशुदा वक्त से पहले लोन चुकाने पर फोर-क्लोजर फीस
यदि आप तयशुदा लोन पीरियड से पहले ही पूरा अमाउंट चुका देना चाहते हैं तो आपको कुछ फोर क्लोजर फीस देनी पड़ सकती है। विभिन्न बैंकों या लोन पीरियड के लिहाज से ये शुल्क अलग-अलग हो सकते हैं। आमतौर पर इसकी गणना बाकी बचे लोन के आधार पर की जाती है। कुछ बैंक इसकी अनुमति एक निश्चित अवधि के बाद ही देते हैं। विभिन्न बैंकों में इस संबंध में अलग-अलग नियम हो सकते हैं।
लोन से पहले जानें ये बातें
1. ब्याज दरें फिक्स्ड हैं या फ्लोटिंग?
2. लोन प्रोसेसिंग फीस क्या है?
3. पार्ट-पेमेंट और प्री-पेमेंट क्लॉज क्या हैं?
4. चेक बाउंस होने पर कितना शुल्क है?
5. डुप्लीकेट एनओसी के लिए कोई फीस है या नहीं?
6. हिडन चार्जेस हैं या नहीं?
फ्लोटिंग या फिक्स्ड ब्याज दर
टू-व्हीलर्स के लिए फिक्स्ड रेट बेहतर है। फ्लोटिंग रेट बैंक के बेस रेट से जुड़ी होती हैं, ऐसे में लोन पीरियड के दौरान बैंक इसमें बदलाव कर सकता है। फ्लोटिंग रेट में बढऩे की संभावना ज्यादा होती है। वहीं फिक्स्ड ब्याज दर पूरे लोन पीरियड में अपरिवर्तित रहती है।
Published on:
11 Dec 2016 03:48 pm
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