
प्रतीकात्मक तस्वीर (PC: AI)
भारत में डिजिटल पेमेंट क्रांति का सबसे बड़ा चेहरा यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई है। छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी तक, हर स्तर पर यूपीआई ने लेनदेन को आसान और तेज बनाया है। लेकिन तेज विस्तार के पीछे छिपी लागत अब सिस्टम पर भारी पड़ने लगी है। शून्य मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी जीरो एमडीआर नीति के चलते बैंकों और फिनटेक कंपनियों की आय सीमित है। यही कारण है कि बजट 2026 से यूपीआई के लिए फंडिंग और कमाई के मॉडल पर बड़े फैसले की उम्मीद की जा रही है।
ईटी की एक रिपोर्ट के अनुसार यूपीआई आज देश के लगभग 85 प्रतिशत डिजिटल लेनदेन को संभाल रहा है। हर महीने बड़ी संख्या में ट्रांजेक्शन प्रोसेस करने के लिए मजबूत टेक्नोलॉजी, साइबर सिक्योरिटी, फ्रॉड रोकथाम और कस्टमर सपोर्ट की जरूरत होती है। इन सभी पर भारी खर्च आता है, लेकिन जीरो एमडीआर के कारण भुगतान सेवा प्रदाताओं को इससे सीधी आय नहीं होती। टियर 2 और टियर 3 शहरों में विस्तार के लिए अतिरिक्त निवेश जरूरी है, जिससे फिनटेक कंपनियों पर आर्थिक दबाव और बढ़ गया है।
सरकार की जीरो एमडीआर नीति ने डिजिटल पेमेंट को आम लोगों और छोटे व्यापारियों तक पहुंचाया, लेकिन इसका बोझ बैंकों और फिनटेक फर्मों को उठाना पड़ रहा है। एक ट्रांजेक्शन की प्रोसेसिंग लागत औसतन 2 रुपये तक बताई जाती है। पहले सरकार की ओर से मिलने वाली इंसेंटिव राशि इस अंतर की कुछ हद तक भरपाई करती थी, लेकिन हाल के सालें में यह फंडिंग तेजी से घटी है। इससे इनोवेशन, नए फीचर और ग्रामीण विस्तार की रफ्तार धीमी होने का खतरा बढ़ा है।
उद्योग जगत का मानना है कि बजट 2026 में यूपीआई के लिए संतुलित रास्ता निकाला जा सकता है। छोटे व्यापारियों और आम नागरिकों के लिए जीरो एमडीआर जारी रखते हुए, बड़े मर्चेंट्स पर सीमित और नियंत्रित एमडीआर लागू करने का सुझाव दिया जा रहा है। इससे सिस्टम को स्थायी आय मिलेगी और सरकार का सब्सिडी का बोझ भी कम होगा। साथ ही डिजिटल साक्षरता और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के लिए संसाधन जुट सकेंगे।
Updated on:
16 Jan 2026, 4:33 PM IST
Published on:
16 Jan 2026, 4:33 PM IST
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