
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के पास 700 जहाज फंसे हुए हैं। (PC: AI)
Iran-Israel War: फारस की खाड़ी को ओमान की खाडी से जोड़ने वाला एक संकरा रास्ता है, जिसे होर्मुज स्ट्रेट कहा जाता है। लेकिन ईरान-अमेरिका युद्ध के चलते यह करीब-करीब बंद है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से हर महीने करीब 3000 जहाज गुजरते थे। इस मार्ग से रोजाना लगभग 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते हैं, जो दुनिया की कुल तेल खपत का लगभग पांचवां हिस्सा और वैश्विक LNG व्यापार का करीब एक-तिहाई है।
ऊर्जा विश्लेषण कंपनी Kpler के अनुसार, इस होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी बाधा का सबसे ज्यादा असर एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है, क्योंकि खाड़ी क्षेत्र का अधिकांश तेल और LNG चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया की ओर जाता है। हालांकि, हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि यह मार्ग सभी देशों के लिए खुला रहेगा, सिवाय "दुश्मनों" के। इससे भारत को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। जहाज मालिक युद्ध क्षेत्र में जाने से बच रहे हैं, जिससे आवाजाही धीमी हो गई है।
हाल के दिनों में केवल 3 टैंकर ही इस मार्ग से गुजर पाए, जो करीब 28 लाख बैरल तेल लेकर गए, जबकि सामान्य तौर पर यह आंकड़ा 2 करोड़ बैरल प्रतिदिन होता है। यानी शिपिंग ट्रैफिक में 86% से 90% तक की गिरावट आई है।
करीब 700 से ज्यादा गैर-ईरानी टैंकर होर्मुज स्ट्रेट के पास फंसे हुए हैं। इनमें 334 कच्चे तेल के टैंकर, 109 डर्टी प्रोडक्ट टैंकर और 263 क्लीन प्रोडक्ट जहाज शामिल हैं। फारस की खाड़ी के अंदर करीब 200 जहाज फंसे हैं, जिनमें 60 बहुत बड़े कच्चे तेल वाले जहाज (VLCC) भी हैं, जो वैश्विक VLCC बेड़े का लगभग 8% हैं। Kpler के अनुसार, जैसे ही अमेरिका-इजराइल-ईरान संघर्ष शुरू हुआ, जहाजों की आवाजाही में करीब 85% गिरावट आ गई। कई जहाज वापस लौट गए या रास्ता बदल लिया। जहां जहाज चल भी रहे हैं, वहां लागत कई गुना बढ़ गई है। युद्ध जोखिम बीमा महंगा हो गया है और कुछ कंपनियां खाड़ी क्षेत्र के कॉन्ट्रैक्ट लेने से ही मना कर रही हैं।
लॉजिस्टिक्स में बाधा आने से बाजार में आपूर्ति प्रभावित हो जाती है, भले ही उत्पादन जारी रहे। अनुमान है कि 90 लाख से 1.2 करोड़ बैरल प्रतिदिन तेल निर्यात प्रभावित हो सकता है। वैकल्पिक पाइपलाइन और रेड सी मार्ग केवल 60-70 लाख बैरल ही संभाल सकते हैं, जो सामान्य 2 करोड़ बैरल से काफी कम है।
भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 89% आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। यह तेल होर्मुज स्ट्रेट से होकर आता है, इसलिए वहां बाधा का सीधा असर भारत पर पड़ता है। भारत LNG और LPG के लिए भी खाड़ी देशों पर निर्भर है। भारत की लगभग 40% गैस जरूरत LNG से पूरी होती है और लगभग सभी LPG कार्गो इसी मार्ग से आते हैं। इसलिए यह संकट परिवहन, उद्योग और घरेलू गैस तीनों को प्रभावित कर सकता है।
कतर के रास लाफान इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स (दुनिया का सबसे बड़ा LNG हब) पर ड्रोन हमले के कारण उत्पादन बंद हो गया। कतर और UAE मिलकर वैश्विक LNG सप्लाई का करीब 20% हिस्सा देते हैं। मार्च के लिए LNG निर्यात का अनुमान घटाकर 5.8 मिलियन टन कर दिया गया है। इससे वैश्विक गैस बाजार में भारी झटका लगा है। 2025 में चीन, भारत, दक्षिण कोरिया और जापान ने बड़ी मात्रा में LNG आयात किया था।
एशिया में LNG की कीमतें बढ़कर 19–20 डॉलर प्रति MMBtu हो गई हैं, जो फरवरी में 10–11 डॉलर थीं। यानी कीमत लगभग दोगुनी हो गई है। भारत में भी इसका असर दिखने लगा है। LPG सिलेंडर की कीमतें 10 से 15% बढ़ गई हैं। गैस सप्लाई में कमी आई है। वहीं, CNG और PNG सप्लाई प्रभावित है।
Updated on:
17 Mar 2026 03:04 pm
Published on:
17 Mar 2026 03:04 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
