
मिडिल ईस्ट में युद्ध से जीडीपी ग्रोथ पर असर पड़ेगा। (PC: AI)
Middle East War: मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव ने भारत की अर्थव्यवस्था के सामने नई मुश्किल खड़ी कर दी है। कच्चे तेल की कीमतें लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं और इसका असर अब धीरे-धीरे लोगों की जेब से लेकर शेयर बाजार तक पर दिखने लगा है। अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो महंगाई, GDP ग्रोथ और कंपनियों की कमाई तीनों पर दबाव बढ़ सकता है। असल चिंता सिर्फ महंगे पेट्रोल-डीजल की नहीं है। डर इस बात का है कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव अगर लंबा खिंच गया, तो भारत की आर्थिक रफ्तार सुस्त पड़ सकती है। हॉर्मुज स्ट्रेट के जरिए दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल और LPG सप्लाई करता है। वहां किसी भी तरह की रुकावट पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी बन सकती है।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि भारत अभी तक अपनी मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और अलग-अलग देशों से तेल खरीदने की रणनीति की वजह से झटका संभाले हुए है। लेकिन हर चीज की एक सीमा होती है। अगर तेल लंबे समय तक महंगा रहा, तो असर ज्यादा गहरा हो सकता है।
पिरामल ग्रुप के चीफ इकोनॉमिस्ट देबोपम चौधरी के मुताबिक, ऊर्जा की कीमतों में तेज उछाल और सप्लाई की दिक्कतों ने इस वित्त वर्ष की शुरुआत में ही आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ा दिया है। सरकारी आंकड़ों में लगातार दो महीने LPG खपत में गिरावट दिखाई दी है। वहीं, एविएशन टर्बाइन फ्यूल की मांग में भी कमजोरी के संकेत मिले हैं।
उनका कहना है कि अगर हॉर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक प्रभावित रहा, तो भारत की GDP ग्रोथ में 0.25 से 0.35 फीसदी तक की कमी आ सकती है। हालांकि, अगर जल्द समझौता हो जाता है और खाड़ी क्षेत्र से सप्लाई सामान्य हो जाती है, तो तेल की कीमतों में राहत मिल सकती है। भारत की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों से 7 फीसदी से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ रही थी। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है। RBI ने FY27 के लिए 6.9 फीसदी GDP ग्रोथ का अनुमान दिया है। वहीं, कई वैश्विक एजेंसियां इससे भी कम ग्रोथ की आशंका जता रही हैं।
संयुक्त राष्ट्र ने भारत की विकास दर 6.4 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है। UBS ने इसे घटाकर 6.2 फीसदी कर दिया है। वहीं, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक ने भी अपना अनुमान 7.1 फीसदी से घटाकर 6.4 फीसदी कर दिया है। इसकी सबसे बड़ी वजह महंगा कच्चा तेल माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत के आयात बिल पर करीब 13 से 14 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ डालती है। युद्ध से पहले भारत करीब 65 डॉलर प्रति बैरल के हिसाब से तेल खरीद रहा था। अब कीमत 100 डॉलर के आसपास पहुंच चुकी है। यानी देश को 50 से 60 अरब डॉलर ज्यादा खर्च करने पड़ सकते हैं।
शेयर बाजार के लिए भी यह आसान समय नहीं माना जा रहा। वेंचुरा के रिसर्च हेड विनीत बोलिंजकर का कहना है कि इस वित्त वर्ष में बाजार से बहुत ज्यादा रिटर्न की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, खासकर उन सेक्टर्स में जो आयात और ब्याज दरों पर ज्यादा निर्भर हैं।
SAMCO Securities के अपूर्व शेठ का मानना है कि असली खतरा सिर्फ तेल की कीमत नहीं, बल्कि उसके बाद आने वाले असर हैं। यानी महंगाई बढ़ेगी, कंपनियों का खर्च बढ़ेगा, लोगों की खरीदारी घटेगी और बाजार पर दबाव आएगा। उन्होंने कहा कि जब तक मिडिल ईस्ट का माहौल शांत नहीं होता, तब तक कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव बना रहेगा। इसी वजह से आने वाले महीनों में निफ्टी 22,500 से 26,500 के दायरे में रह सकता है।
हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। विश्व बैंक का मानना है कि तमाम चुनौतियों के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बना रहेगा। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि मिडिल ईस्ट की आग का धुआं अब भारत की अर्थव्यवस्था तक साफ दिखाई देने लगा है।
Published on:
06 May 2026 05:13 pm
बड़ी खबरें
View Allकारोबार
ट्रेंडिंग
