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2012 में 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट था संसद का खर्चा, हंगामे में बर्बाद होता है टैक्सपेयर्स का काफी सारा पैसा

Parliament Monsoon Session 2026: संसद का मानसून सत्र हंगामे और बार-बार स्थगन के बीच खत्म हुआ है। संसद के कामकाज की लागत का पुराना अनुमान 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट का है, लेकिन वर्तमान लागत इससे काफी बड़ी हो सकती है।
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भारत

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Pawan Jayaswal

Aug 13, 2026

Parliament Cost Per Minute

मानसून सत्र में 12 बिल पास हुए हैं। (PC: AI)

Parliament Cost Per Minute: संसद का मानसून सत्र आज गुरुवार को समाप्त हो गया है। आखिरी दिन लोकसभा की कार्यवाही सिर्फ 1 मिनट चली। वहीं, राज्यसभा की कार्यवाही करीब 1 घंटे चली। इस मानसून सत्र में कुल 12 बिल पास हुए, लेकिन लगातार हंगामे और स्थगन ने संसद के कामकाज के लिए उपलब्ध समय का बड़ा हिस्सा खा लिया। सांसदों को सरकार से सवाल पूछने, नीतियों पर चर्चा करने और कानूनों की बारीकियों की जांच करने के लिए जो समय मिलना चाहिए था, उसका एक हिस्सा हंगामे की भेंट चढ़ गया। नुकसान सिर्फ यही नहीं है। संसद को चलाने में भारी-भरकम पैसा खर्च होता है। वह पैसा भी व्यर्थ चला गया।

संसद के एक मिनट के लिए कितना होता है खर्चा?

संसद के कामकाज पर होने वाले खर्च को लेकर अक्सर 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट का आंकड़ा सामने आता है। यह अनुमान 2012 का है। उस समय तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने बताया था कि लोकसभा और राज्यसभा को चलाने पर करीब 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट खर्च आता है। दोनों सदनों के लिए यह राशि करीब 1.25-1.25 लाख रुपये प्रति मिनट बताई गई थी। PRS Legislative Research ने अपनी एक रिपोर्ट में संसद में व्यवधान के आर्थिक असर को समझाने के लिए इसी पुराने अनुमान का इस्तेमाल किया है। हालांकि, यह आज की तारीख में संसद चलाने की आधिकारिक लागत नहीं है। 2012 के बाद महंगाई और अन्य खर्च बढ़ चुके हैं। इसलिए मौजूदा समय में वास्तविक लागत इससे ज्यादा हो सकती है।

सिर्फ तीन दिन के हंगामे में हुआ था 23 करोड़ का नुकसान

संसद में हंगामे की कीमत समझने के लिए 2025 के मानसून सत्र का एक उदाहरण काफी है। उस सत्र के शुरुआती तीन दिनों में लोकसभा के 1,026 मिनट और राज्यसभा के 816 मिनट बर्बाद हुए थे। 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट के पुराने अनुमान से देखें तो इन तीन दिनों में करीब 23 करोड़ रुपये के संसदीय समय का नुकसान हुआ था। इसमें लोकसभा का हिस्सा करीब 12.83 करोड़ रुपये और राज्यसभा का करीब 10.2 करोड़ रुपये था।

इस कैलकुलेशन का मतलब यह नहीं है कि सदन एक मिनट के लिए स्थगित हुआ और सरकार के 2.5 लाख रुपये सीधे डूब गए। संसद की इमारत, कर्मचारी, सुरक्षा, तकनीक और दूसरी व्यवस्थाओं पर खर्च वैसे भी जारी रहता है। इस आंकड़े को संसद के कामकाज के लिए उपलब्ध समय की अनुमानित कीमत के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।

असली नुकसान पैसे से कहीं बड़ा

संसद में व्यवधान का सबसे बड़ा नुकसान रुपये-पैसे में नहीं मापा जा सकता। जब सदन बार-बार स्थगित होता है, तो सांसदों के पास मंत्रियों से सवाल पूछने, विधेयकों पर चर्चा करने और जनता से जुड़े जरूरी मुद्दे उठाने का समय कम हो जाता है। यहीं से संसद की जवाबदेही वाली भूमिका प्रभावित होती है। अगर संसद में हंगामे न हों, तो विधेयक पारित हो सकते हैं। इन विधेयकों पर पर्याप्त बहस हो सकती है और बिल की बारीकियों को जांचने का समय मिल सकता है।

Question Hour में हंगामा यानी बड़ा नुकसान

प्रश्नकाल संसद की कार्यवाही का वह हिस्सा है, जब सांसद सरकार के कामकाज, नीतियों और अलग-अलग मंत्रालयों से जुड़े मुद्दों पर सीधे सवाल पूछते हैं। इसकी खासियत यह है कि कई सवालों का मंत्री सदन में मौखिक जवाब देते हैं। इसके बाद सांसद उसी जवाब के आधार पर पूरक सवाल भी पूछ सकते हैं। वहीं, कई सवालों के जवाब लिखित रूप में दिए जाते हैं। प्रश्नकाल वह मौका है जब सांसद किसी मंत्रालय से तथ्य, आंकड़े, समयसीमा और फैसलों के पीछे की वजह पूछ सकते हैं और संबंधित मंत्री को सदन में जवाब देना पड़ता है। अगर इसी दौरान सदन में हंगामा होता है और कार्यवाही स्थगित हो जाती है, तो जवाबदेही की यह पूरी कड़ी टूट जाती है।

संसद में प्रश्नकाल का समय हंगामे की वजह से प्रभावित होना कोई नई बात नहीं है। 16वीं लोकसभा के दौरान लोकसभा में प्रश्नकाल अपने तय समय का करीब 67 फीसदी ही चल पाया था। PRS के अनुसार पिछली चार लोकसभाओं में यह औसत करीब 59 फीसदी ही चल पाया। 2023 के मानसून सत्र में राज्यसभा में आठ दिन ऐसे रहे, जब प्रश्नकाल एक मिनट से भी कम चला।

विधेयकों पर नहीं हो पाती पर्याप्त चर्चा

पीआरएस के पुराने आंकड़ों के मुताबिक, साल 2023 के मानसून सत्र में लोकसभा ने 20 विधेयक ऐसे पारित किए, जिनमें प्रत्येक पर एक घंटे से भी कम चर्चा हुई। इनमें से 9 विधेयक 20 मिनट के भीतर पारित हो गए थे। साल 2025 के मानसून सत्र में भी कई विधेयक सीमित चर्चा के साथ पारित किए गए। पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च लंबे समय से संसद में व्यवधान को एक गंभीर समस्या बताता रहा है। उसके मुताबिक लगातार होने वाला व्यवधान सांसदों की सवाल पूछने, कानूनों पर चर्चा करने और जरूरी सार्वजनिक मुद्दे उठाने की क्षमता को प्रभावित करता है।

आखिर टैक्सपेयर को क्या मिलता है?

संसद का पूरा खर्च जनता के पैसे से चलता है। सांसदों से लेकर कर्मचारियों, सुरक्षा, इमारतों, तकनीक और दूसरी व्यवस्थाओं तक हर चीज पर सरकारी खजाने से पैसा खर्च होता है। पीआरएस के अनुसार, इस खर्च की कीमत सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि कितने विधेयक पारित हुए। यह भी उतना ही जरूरी है कि सांसदों को सवाल पूछने का मौका मिला या नहीं, मंत्रियों ने जवाब दिए या नहीं, कानूनों पर पर्याप्त चर्चा हुई या नहीं और सरकार के फैसलों की जांच कितनी हुई।