10 अक्टूबर 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

US Russia Deal: दूसरों के लिए प्रतिबंध और खुद के लिए मौका, ट्रंप की एनर्जी पॉलिसी में क्यों है डबल स्टैंडर्ड?

US Russia Diesel Deal: अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रावधान किया है, लेकिन अब खुद रूस से डीजल खरीदने जा रहा है। इससे अमेरिकी नीति में दोहरे मापदंडों पर बहस तेज हो सकती है।
3 min read
Google source verification

भारत

•

image

Pawan Jayaswal

•

Oct 10, 2026

us russia diesel deal

अमेरिका रूस से तेल खरीद रहा है। (PC: AI)

अमेरिका ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार हासिल किया है। लेकिन इस फैसले के कुछ ही दिनों बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया कि अमेरिका अपनी जरूरतों के लिए रूस से डीजल खरीदेगा। इससे भारत को अमेरिकी नीति में दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाने का मौका मिल गया है। भारत पर भी रूस से तेल खरीदने के कारण अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा चुका है।

पहले प्रतिबंधों का कानून, फिर रूस से डीजल खरीदने का फैसला

अमेरिका ने 2 अक्टूबर को लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026 पास किया है। इस कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीद जारी रखने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है। हालांकि, इसके ठीक एक सप्ताह बाद 9 अक्टूबर को ट्रंप ने कहा कि रूस अमेरिका को तत्काल 3 लाख टन से ज्यादा डीजल की आपूर्ति करेगा। इसके बाद और बड़ी खेप भेजे जाने की भी संभावना है। अमेरिका का यह कदम ऐसे समय आया है, जब वह रूस से एनर्जी प्रोडक्ट्स खरीदने वाले देशों पर दबाव बढ़ाने की नीति अपना रहा है। भारत पहले ही इस नीति का असर झेल चुका है।

अमेरिका को क्यों पड़ रही रूसी डीजल की जरूरत?

फरवरी में शुरू हुए ईरान युद्ध के बाद दुनियाभर में एनर्जी प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ी हैं। इसका असर अमेरिका में भी देखने को मिल रहा है। अमेरिकी ऑटोमोबाइल एसोसिएशन (AAA) के मुताबिक, वहां डीजल की औसत कीमत 6.28 डॉलर प्रति गैलन पहुंच गई है। सितंबर के अंत में यह रिकॉर्ड 6.53 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई थी। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में ट्रंप फ्यूल की कीमतें तेजी से घटाने का भरोसा दे रहे हैं। घरेलू बाजार में कीमतों को काबू में रखने की जरूरत अब अमेरिकी ऊर्जा नीति पर भी भारी पड़ती दिख रही है।

रूस से तेल खरीदने पर भारत पर लगाया था अतिरिक्त टैरिफ

अमेरिका ने 2025 में भारत से आने वाले सामान पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया था। इसकी वजह रूस से भारत की तेल खरीद को बताया गया था। व्हाइट हाउस का तर्क था कि रूस से तेल खरीदने के कारण उसकी अर्थव्यवस्था को मदद मिलती है, जिससे यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने में उसे आर्थिक ताकत मिलती है। अब अमेरिका खुद रूस से डीजल खरीदने जा रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि अगर अमेरिका अपनी घरेलू जरूरतों के लिए रूस से फ्यूल खरीद सकता है, तो भारत को ऐसा करने पर दंडित क्यों किया गया?

भारत के लिए रूस क्यों है अहम?

भारत अपनी जरूरत का करीब 90% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 30.3% रही। इस दौरान भारत ने रूस से 40.8 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा, जबकि कुल आयात बिल 134.7 अरब डॉलर था। जुलाई में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर था और कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी आधे से भी ज्यादा हो गई थी। उस महीने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) 10.8% हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर था।

आंकड़े बताते हैं कि भारत ने अप्रैल-जून 2025 की तुलना में अप्रैल-जून 2026 के दौरान रूस से तेल खरीद की हिस्सेदारी 7.2 प्रतिशत बढ़ाई। इस अवधि में भारत ने इराक और अमेरिका से तेल खरीद पर अपनी निर्भरता कम की। हालांकि, युद्ध के कारण महंगे होते कच्चे तेल ने भारत का आयात बिल बढ़ा दिया। मई में यह बढ़कर 18.7 अरब डॉलर पर पहुंच गया। वहीं, जून तक कच्चे तेल का आयात घटकर 1.89 करोड़ टन रह गया।

भारत ने अमेरिका को याद दिलाया अपना पुराना रुख

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर पहले कह चुके हैं कि 2022 में अमेरिका ने ही भारत से वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदने को कहा था। भारत का तर्क है कि ऊर्जा खरीद के मामले में उसके साथ अलग व्यवहार नहीं होना चाहिए। सरकार यूरोपीय संघ का उदाहरण भी देती है। उसके मुताबिक, यूरोपीय संघ और रूस के बीच 2024 में 67.5 अरब यूरो का वस्तु व्यापार हुआ था। ऐसे में सिर्फ भारत को निशाना बनाना उचित नहीं है।

यूक्रेन ने भी जताई नाराजगी

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रूस को पेट्रोलियम उत्पाद बेचने की अनुमति देने पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि इससे ऐसे युद्ध में निवेश बढ़ेगा, जिसे खत्म किया जाना चाहिए, न कि लंबा खींचा जाना चाहिए। जेलेंस्की के मुताबिक, रूसी ऊर्जा उत्पादों से होने वाली कमाई मॉस्को को अपना सैन्य अभियान जारी रखने में मदद करेगी।

अमेरिका की पॉलिसी में हैं डबल स्टैंडर्ड

अमेरिका का तर्क रहा है कि रूस से तेल खरीदने वाले देश उसकी युद्ध क्षमता को आर्थिक मदद पहुंचाते हैं। लेकिन अब जब खुद अमेरिका घरेलू ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए रूस से डीजल खरीद रहा है, तो उसकी नीति पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। यह मामला दिखाता है कि ऊर्जा से जुड़े फैसलों में हर देश अपने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देता है। अमेरिका अपनी जरूरतों के लिए रूसी ईंधन खरीदने को सही ठहरा रहा है। ऐसे में भारत भी यही सवाल उठा सकता है कि उसकी ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक हितों को अलग नजरिए से क्यों देखा जाए।