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Ganga Hilsa Fish: गंगा में 30 साल बाद लौटी हिलसा, बाजार में 2800 रुपये किलो तक भाव, चंदौली में मिलना क्यों है बड़ी खुशखबरी?

Ganga River Ecosystem: चंदौली में करीब 30 साल बाद गंगा के ऊपरी हिस्से में हिलसा मछली मिली है। जानें हिलसा की वापसी को गंगा के पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार का संकेत क्यों माना जा रहा है।
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Hilsa Fish in Ganga Ganga River Ecosystem Hilsa Fish Return

चंदौली में गंगा नदी में हिलसा मछली पाई गई है (photo- chatgtp)

Hilsa Fish in Ganga: गंगा में करीब तीन दशक बाद हिलसा मछली का ऊपरी हिस्से तक पहुंचना सिर्फ मछली मिलने की खबर नहीं है। वैज्ञानिकों के लिए यह नदी के बदलते पर्यावरण और जलीय जीवन के लिए बेहतर होती परिस्थितियों का संकेत है। चंदौली में हिलसा की मौजूदगी ने गंगा की सफाई और संरक्षण की कोशिशों को लेकर नई उम्मीद जगाई है।

चंदौली में मिली दो हिलसा, वजन करीब 740 ग्राम

उत्तर प्रदेश के चंदौली में गंगा नदी से हिलसा मछली मिलने की खबर ने लोगों का ध्यान खींचा है। सेंट्रल इनलैंड फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CIFRI) के मुताबिक, टांडा खुर्द में मार्कंडेय महादेव मंदिर के पास गंगा से दो हिलसा मछलियां मिलीं। दोनों का कुल वजन करीब 740 ग्राम बताया गया है। खास बात यह है कि गंगा के ऊपरी हिस्सों में हिलसा की मौजूदगी लंबे समय से बेहद कम हो गई थी। ऐसे में चंदौली तक इसका पहुंचना नदी के पारिस्थितिक तंत्र में हो रहे बदलाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हिलसा का लौटना क्यों है बड़ी बात?

हिलसा सामान्य मछली नहीं है। यह अपना अधिकांश जीवन समुद्र में बिताती है, लेकिन प्रजनन के लिए नदियों की ओर आती है। समुद्र से नदी की तरफ उसका यह सफर पानी की गुणवत्ता, बहाव और पर्यावरणीय परिस्थितियों पर काफी निर्भर करता है। यानी अगर किसी नदी में हिलसा दूर तक पहुंच रही है तो इसका मतलब यह हो सकता है कि उस हिस्से में उसके लिए जरूरी परिस्थितियां पहले की तुलना में बेहतर हुई हैं। पानी में पर्याप्त ऑक्सीजन, सही तापमान, अच्छा प्रवाह और प्रवास के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित रास्ता हिलसा के लिए अहम हैं।

फरक्का बैराज के बाद प्रभावित हुआ था हिलसा का सफर

गंगा में हिलसा के प्रवास की चर्चा फरक्का बैराज से भी जुड़ी रही है। वर्ष 1975 में फरक्का बैराज बनने के बाद हिलसा के पारंपरिक प्रवास मार्ग में बाधा आई। इसके चलते बैराज के ऊपर के हिस्सों में हिलसा की उपलब्धता में गिरावट दर्ज की गई। बाद में वैज्ञानिक संस्थानों और नमामि गंगे से जुड़े कार्यक्रमों के तहत हिलसा की आबादी और उसके प्रवास को बढ़ावा देने के प्रयास किए गए। इसके लिए नदी में बड़ी संख्या में हैचरी से तैयार स्पॉन और निषेचित अंडे छोड़े गए। मछलियों की टैगिंग और निगरानी के जरिए यह भी समझने की कोशिश की गई कि वे नदी में कितनी दूर तक पहुंच रही हैं।

पहले मिर्जापुर, अब चंदौली तक पहुंची

हिलसा के संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों के दौरान पिछले कुछ वर्षों में इसके नदी के ऊपरी हिस्से की ओर बढ़ने के संकेत मिले। वर्ष 2023 से 2025 के बीच मिर्जापुर तक हिलसा की मौजूदगी के प्रमाण सामने आए थे। अब चंदौली में इसके मिलने से वैज्ञानिकों को यह समझने का मौका मिल रहा है कि हिलसा का प्रवास क्षेत्र धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। हालांकि, सिर्फ दो मछलियों के मिलने को गंगा के पूरी तरह स्वस्थ हो जाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके लिए लंबे समय तक पानी की गुणवत्ता, मछलियों की संख्या, प्रजनन और अन्य जलीय जीवों की स्थिति की निगरानी जरूरी होगी। फिर भी यह एक सकारात्मक संकेत जरूर है।

गंगा डॉल्फिन की बढ़ती संख्या भी उम्मीद जगाती है

गंगा में बदलाव का एक और महत्वपूर्ण संकेत गंगा डॉल्फिन की स्थिति से जुड़ा है। उपलब्ध देशव्यापी सर्वेक्षणों में गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र में हजारों गंगा डॉल्फिन दर्ज की गई हैं। डॉल्फिन को रहने के लिए पर्याप्त पानी, भोजन और अपेक्षाकृत बेहतर जलीय वातावरण की जरूरत होती है। इसलिए हिलसा और डॉल्फिन जैसे जीवों की मौजूदगी गंगा के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को समझने में वैज्ञानिकों के लिए अहम है।

‘मछलियों की रानी’ क्यों कहलाती है हिलसा?

हिलसा को बंगाल और बांग्लादेश में खास तौर पर पसंद किया जाता है। इसकी चमकीली चांदी जैसी त्वचा और खास स्वाद के कारण इसे कई जगह ‘मछलियों की रानी’ भी कहा जाता है। बंगाली में इसे इलिश और अंग्रेजी में Hilsa Shad या Hilsa Herring के नाम से जाना जाता है। यह सिर्फ खाने तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाल, त्रिपुरा, ओडिशा और बांग्लादेश की खानपान संस्कृति का भी अहम हिस्सा है। त्योहारों और खास मौकों पर हिलसा की मांग बढ़ जाती है।

हिलसा में मिलते हैं ओमेगा-3 और प्रोटीन

पोषण के लिहाज से भी हिलसा एक महत्वपूर्ण मछली है। इसमें प्रोटीन और ओमेगा-3 फैटी एसिड पाए जाते हैं। ओमेगा-3 शरीर के लिए जरूरी फैटी एसिड है, जो सामान्य हृदय और मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अलावा मछली में विटामिन डी और कुछ अन्य माइक्रोन्यूट्रिएंट भी मिलते हैं। हालांकि किसी एक खाद्य पदार्थ को बीमारी का इलाज या किसी खास स्वास्थ्य लाभ की गारंटी मानना सही नहीं है। संतुलित डाइट में मछली को शामिल करना ही ज्यादा महत्वपूर्ण है।

गंगा में सिर्फ हिलसा नहीं, 140 से ज्यादा मछली प्रजातियां

गंगा का जलीय संसार काफी विविध है। नदी में रोहू, कतला, मृगल, महाशीर और हिलसा जैसी कई मीठे पानी की मछलियां पाई जाती हैं। इसके अलावा गंगा डॉल्फिन जैसा दुर्लभ स्तनधारी भी इस नदी के पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा है। इसलिए चंदौली में करीब 30 साल बाद हिलसा की वापसी को सिर्फ एक मछली के मिलने की घटना के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। यह इस बात की याद दिलाती है कि नदी को बचाने का मतलब केवल पानी को साफ करना नहीं, बल्कि उसके पूरे जलीय जीवन और प्राकृतिक प्रवास मार्ग को सुरक्षित रखना भी है।

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