
आलस्य मनुष्य का बड़ा शत्रु
अरक्कोणम. यहा विराजित आचार्य महाश्रमण ने उद्बोधन देते हुए कहा कि ज्ञान दो प्रकार का होता है-एक कुएं की पानी की तरह और दूसरा ज्ञान कुंड के पानी की तरह होता है। कुएं में जिस तरह से जल स्वत: ही निकलता रहता है उसी प्रकार पहले प्रकार का ज्ञान अतीन्द्रिय होता है। केवलज्ञान आदि कुएं के ज्ञान के समान है जो किसी पुस्तक आदि से नहीं बल्कि स्वत: स्वयं के भीतर से ही प्राप्त होता है। स्वाध्याय, श्रुतज्ञान आदि कुंड के पानी के समान है। जिस तरह से कुंड में कहीं से पानी भरा जाता है उसी प्रकार श्रुतज्ञान और स्वाध्याय द्वारा ज्ञानार्जन किया जाता है।
ज्ञान के क्षेत्र में विकास करने वालों की नींद को सम्मान नहीं देना चाहिए। नींद स्वाध्याय में बाधक तत्व है। आदमी को जागरूक रहते हुए स्वाध्याय करते रहने का प्रयास करना चाहिए। आलस्य मनुष्य का महान शत्रु है तो मनुष्य के भीतर ही रहता है। आदमी को आलस्य से बचने का प्रयास करना चाहिए। विकास करने वाले का परिश्रम के समान कोई बंधु नहीं होता। परिश्रम करने का प्रयास करना चाहिए। अति नींद और अति भोजन से बचने का प्रयास करना चाहिए। ज्यादा मजाक, ज्यादा हंसना भी स्वाध्याय में बाधक बन सकता है। इसलिए आदमी को इससे भी बचने का प्रयास करना चाहिए।
ज्ञान के पुनरावर्तन का भी प्रयास करना चाहिए। ज्ञान का यदि पुनरावर्तन न किया जाए तो ज्ञान विस्मृत भी हो सकता है। पुनरावर्तन से ज्ञान ताजा हो सकता है। घोड़े का अपनाए पान का सपनाए विद्या का भूलना और रोटी का जलना इसलिए हो सकता है कि उसे फेरा नहीं गया। इसलिए आदमी को सीखे हुए ज्ञान का पुनरावर्तन करते रहना चाहिए। आदमी को निरंतर ज्ञान प्राप्ति की दिशा में आगे बढऩे का प्रयास करना चाहिए और आदमी के जीवन में ज्ञान और आचार का योग हो जाए तो जीवन अच्छा बन सकता है।
इस मौके पर आचार्य ने लोगों को अहिंसा यात्रा के संकल्प करवाए। आचार्य का अभिनन्दन करते हुए तेरापंथी सभा के अध्यक्ष चैनराज दरला, वर्धमान श्रमण संघ की ओर से प्रकाश धारीवाल व मूर्तिपूजक समाज के अध्यक्ष सुरेन्द्र छाजेड़ ने विचार व्यक्त किए। महिला मंडल के साथ कन्या मंडल पर स्थानीय तेरापंथ युवक परिषद ने गीतिका प्रस्तुत की। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने भी प्रस्तुति दी।
Published on:
04 Dec 2018 08:12 pm
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