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सावधान! कहीं आपकी डिग्री भी तो फर्जी नहीं? सोशल मीडिया से चल रहा था 14 यूनिवर्सिटीज का फर्जी खेल, कानपुर में मास्टरमाइंड गिरफ्तार

हर डिग्री की कीमत तय थी। बी फार्मा, डी-फार्मा के लिए 2.50 लाख, एलएलबी और बीटेक की डिग्री 1.50 लाख, बीए, बीएससी व बीकाम के लिए 75 हजार रुपए और इंटर की मार्कशीट के लिए 50 हजार रुपए लेते थे।

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accused

आरोपी

गिरोह में काम बंटा हुआ था,कोई डेटा जुटाता, कोई डिजाइन बनाता, तो कोई फर्जी मुहर और हस्ताक्षर तैयार करता

शिक्षा के नाम पर फर्जीवाड़े का एक ऐसा सिंडिकेट पकड़ा गया है, जिसने देशभर के शैक्षणिक गलियारों में खलबली मचा दी है। उत्तर प्रदेश की कानपुर पुलिस ने एक ऐसे अंतरराज्यीय गिरोह का भंडाफोड़ किया है, जो घर बैठे मनचाही डिग्री और मार्कशीट उपलब्ध कराने का दावा कर रहा था। पुलिस आयुक्त रघुबीर लाल के निर्देशन में हुई इस कार्रवाई में मास्टरमाइंड गिरधारी उर्फ गिरीश और उसके साथियों शैलेंद्र कुमार, नागेन्द्र मणि त्रिपाठी, जोगेन्द्र, अश्वनी निगम को गिरफ्तार किया गया है।

कॉर्पोरेट स्टाइल में बंटा था काम: जानें कौन क्या करता था

पुलिस की जांच में खुलासा हुआ है कि इस गिरोह का संचालन किसी पेशेवर कंपनी की तरह होता था। गिरोह के प्रत्येक सदस्य को उनकी विशेषज्ञता के आधार पर अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं।

शैलेंद्र कुमार (सरगना) व गिरधारी (मास्टरमाइंड): ये गिरोह के मुख्य योजनाकार थे, जो पूरे नेटवर्क की निगरानी करते थे और विश्वविद्यालयों के चयन से लेकर सौदे की रकम तय करने तक का काम संभालते थे।

नागेन्द्र मणि त्रिपाठी व जोगेन्द्र (डेटा कलेक्शन): इनका मुख्य काम सोशल मीडिया (फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप) के जरिए उन ग्राहकों की तलाश करना था, जो बिना परीक्षा दिए शॉर्टकट से डिग्री हासिल करना चाहते थे। ये अभ्यर्थियों को झांसे में लेकर उनका डेटा जुटाते थे।

अश्वनी निगम व अन्य साथी (डिजाइनिंग व फोर्जिंग): इस टीम की जिम्मेदारी तकनीकी थी। ये असली मार्कशीट की हूबहू डिजाइन तैयार करते थे ताकि कोई पहचान न सके। साथ ही, विभिन्न विश्वविद्यालयों के सक्षम अधिकारियों के जाली हस्ताक्षर और रबर की मुहरें (फोर्जिंग) तैयार करने में ये माहिर थे।

डिलीवरी नेटवर्क: सौदा तय होने के बाद हजारों से लाखों रुपए वसूल कर फर्जी दस्तावेज अभ्यर्थियों तक सुरक्षित पहुंचाना इस गिरोह की अंतिम कड़ी थी।

जांच के घेरे में आए ये 14 विश्वविद्यालय

पुलिस द्वारा जब्त दस्तावेजों के आधार पर इन संस्थानों के नाम फर्जीवाड़े में उपयोग किए गए हैं:

1. छत्रपति शाहूजी महाराज विवि, कानपुर

2. श्री कृष्णा विवि, छतरपुर

3. स्वामी विवेकानंद सुभारती विवि, मेरठ4. मंगलायतन विवि, अलीगढ़

5. जामिया उर्दू, अलीगढ़

6. लिग्या विवि, फरीदाबाद

7. जेएस विवि, शिकोहाबाद

8. एशियन विवि, मणिपुर

9. ग्लोकल विवि, सहारनपुर

10. सिक्किम प्रोफेशनल विवि, सिक्किम

11. प्रज्ञान इंटरनेशनल विवि, झारखंड

12. हिमालयन विवि, ईटानगर

13. हिमालयन गढ़वाल विवि, उत्तराखंड

14. मोनाड विवि, हापुड़

पांच आरोपी फरार

गिरोह के पांच आरोपी अभी भी फरार हैं। हर डिग्री की कीमत तय थी। बी फार्मा, डी-फार्मा के लिए 2.50 लाख, एलएलबी और बीटेक की डिग्री 1.50 लाख, बीए, बीएससी व बीकाम के लिए 75 हजार रुपए और इंटर की मार्कशीट के लिए 50 हजार रुपए लेते थे। गिरोह के पास से 1000 से ज्यादा डिग्री व मार्कशीट फर्जी माग्रेशन बुकलेट, डिप्टी रजिस्ट्रार की नकली मोहरें समेत 80 प्रपत्र, स्कॉर्पियो और आई-20 कार बरामद की।

एसकेयू बोला- ऑनलाइन प्रक्रिया, कोई अधिकृत एजेंट नहीं

इस मामले में श्री कृष्णा यूनिवर्सिटी छतरपुर के रजिस्ट्रार दिगंत द्विवेदी ने कहा कि पुलिस से आधिकारिक प्रति मिलने पर दस्तावेजों का मिलान किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि विवि का कोई एजेंट नहीं है। जालसाजों से सुरक्षा के लिए अब विवि की सभी डिग्रियां और मार्कशीट डिजिलॉकर पर उपलब्ध कराई जा रही हैं, ताकि उनकी प्रमाणिकता की तुरंत जांच हो सके।

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