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1931 में जलियांवाला जैसी गोलियां झेलीं, गांधीजी संग जेल गए… 16 साल से 15 अगस्त पर दरवाजे को निहारती हैं 90 की बेवा, बेटा बोला— क्या सम्मान की भी एक्सपायरी डेट होती है?

ब्रिटिश हुकूमत ने स्वाधीनता का नारा लगाने वाली निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दी थीं। इतिहास ने इस लोमहर्षक घटना को चरण पादुका गोलीकांड और मध्यप्रदेश का जलियांवाला बाग कहा।
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vimla singh

बहु बेटे के साथ विमला सिंह

14 जनवरी 1931 का वह दिन बुंदेलखंड के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है। पूरा देश मकर संक्रांति का पर्व मना रहा था, लेकिन छतरपुर के पास सिंहपुर में उर्मिल नदी का किनारा मासूमों और देशभक्तों के खून से लाल हो रहा था। ब्रिटिश हुकूमत ने स्वाधीनता का नारा लगाने वाली निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दी थीं। इतिहास ने इस लोमहर्षक घटना को चरण पादुका गोलीकांड और मध्यप्रदेश का जलियांवाला बाग कहा।

उसी चरण पादुका गोलीकांड के चश्मदीद गवाह और उस आग में तपे एक जांबाज नौजवान थे— रामसिंह परिहार। उन्होंने न सिर्फ उस गोलीकांड की भयावहता को अपनी आंखों से देखा, बल्कि आगे चलकर महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में भी कंधे से कंधा मिलाकर हिस्सा लिया। अंग्रेजों की लाठियां खाईं, जेल की सलाखों के पीछे यातनाएं सहीं, लेकिन आजादी का तिरंगा झुकने नहीं दिया। 1947 में जब देश आजाद हुआ, तो रामसिंह को लगा होगा कि आजाद भारत अपने सिपाहियों की कुर्बानी को कभी नहीं भूलेगा। लेकिन आज आजादी के 79 साल बाद हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।

2010 में थमीं सांसें, फाइलों में दफन हो गई प्रशासनिक याददाश्त

लवकुशनगर तहसील के ग्राम रंगोली के निवासी स्वतंत्रता सेनानी रामसिंह परिहार वर्ष 2010 तक जीवित रहे। जब तक उनकी सांसें चलीं, तब तक 15 अगस्त और 26 जनवरी पर प्रशासन की नींद थोड़ी खुली रहती थी। उन्हें राष्ट्रीय पर्वों पर आमंत्रित कर लिया जाता था, मंच पर कुर्सी पर बैठाकर तस्वीरें खिंच जाती थीं। लेकिन 15 अगस्त 2010 को उनके निधन के साथ ही प्रशासनिक संवेदनाएं भी दम तोड़ गईं। रामसिंह के जाने के बाद मानो सरकारी फाइलों से उनका नाम हमेशा के लिए मिटा दिया गया। आज 16 साल बीत चुके हैं, लेकिन स्वतंत्रता सेनानी के इस घर में न तो कोई सरकारी निमंत्रण पत्र आया, न कोई अधिकारी हाल-चाल जानने पहुंचा और ना ही सम्मान के दो शब्द नसीब हुए।

90 साल की बूढ़ी आंखें आज भी दरवाजे पर टिकी हैं

रामसिंह की पत्नी विमला सिंह आज 90 वर्ष से अधिक की हो चुकी हैं। ढलती उम्र के कारण शरीर झुक चुका है, नजरें धुंधला गई हैं, लेकिन उम्मीद का दीया आज भी दिल में जल रहा है। हर बार जब स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस की तारीख करीब आती है, तो विमला जी की निगाहें घर के मुख्य दरवाजे पर ही टिकी रहती हैं।

बेटा, 16 राष्ट्रीय पर्व निकल गए। एक बार भी कोई पूछने नहीं आया कि बुढ़िया जिंदा है या नहीं। जिस आदमी ने देश के लिए जेल काटी, गोलियों का सामना किया, आज उसके नाम का कोई लेवा-देवा ही नहीं रहा... - यह कहते-कहते विमला सिंह की बूढ़ी आंखें छलक पड़ती हैं।

जब पूरे शहर में लाउडस्पीकर पर देशभक्ति के गीत बजते हैं, बच्चे हाथों में तिरंगा लिए परेड करते हैं, तब विमला को अपने दिवंगत पति की बातें याद आती हैं। रामसिंह कहा करते थे— एक दिन ऐसा आएगा जब आजाद देश हमारी कुर्बानी को सलाम करेगा। आज विमला सोचती हैं कि सलाम तो दूर, प्रशासन को उनका नाम लेना भी गवारा नहीं है।

बेटा पूछता है— क्या सम्मान की भी कोई एक्सपायरी डेट होती है?

रामसिंह के बेटे मलखान सिंह अब घर की जिम्मेदारी संभालते हैं। उनके दिल में किसी पेंशन या सरकारी मदद की लालसा नहीं है, बल्कि एक गहरा स्वाभिमानी दर्द है।मलखान सिंह बताते हैं, हम सम्मान के भूखे नहीं हैं और न ही हमें कोई पेंशन चाहिए। लेकिन यह सोचकर आत्मा रो पड़ती है कि जिस पिता ने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, क्या प्रशासन के पास उनकी याद के लिए 2 मिनट का समय भी नहीं है? क्या स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान की भी कोई एक्सपायरी डेट होती है जो उनके जाने के बाद खत्म हो जाती है?

मलखान की आवाज भर्रा जाती है— पिताजी के रहते एक-दो बार बुलावा आया था। उनके जाने के बाद लगा जैसे प्रशासन ने हमारी फाइल ही बंद कर दी। न कोई अफसर आया, न कोई जनप्रतिनिधि। हम गुमनामी में जी रहे हैं।

कुर्ते में बसी है आजादी की खुशबू

रामसिंह का परिवार आज भी उसी कच्चे मकान में रहता है जहां कभी वे अपने बच्चों को आजादी के आंदोलनों की कहानियां सुनाया करते थे। मिट्टी की दीवार पर महात्मा गांधी की एक पुरानी तस्वीर टंगी है और कमरे के एक कोने में रामसिंह का वह पुराना कुर्ता रखा हुआ है जिसे पहनकर वे आंदोलनों में जाया करते थे। विमला सिंह हर 15 अगस्त को उस कुर्ते को निकालकर सहलाती हैं और अपने आंसुओं से उसे पोंछती हैं।

विरासत में मिली है देशभक्ति: दो पीढ़ियों का समर्पण

मलखान सिंह बताते हैं कि उनके परिवार को देशभक्ति विरासत में मिली है। उनके दादा हीरा सिंह परिहार भी स्वाधीनता संग्राम सेनानी थे, जो वर्ष 1900 से ही अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय रहे। अपने पिता को देखते हुए ही रामसिंह ने भी कांटों भरा यही रास्ता चुना। परिवार की दो-दो पीढ़ियों ने देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया, लेकिन आज वही परिवार तंत्र की बेरुखी का शिकार है।

पत्रिका की अपील

चरण पादुका गोलीकांड का जिक्र आज भी इतिहास की किताबों में दर्ज है। शिक्षक बच्चों को बताते हैं कि कैसे उर्मिल नदी का पानी लाल हो गया था। लेकिन उस इतिहास के प्रत्यक्षदर्शी रहे रामसिंह के परिवार को 16 साल से किसी राष्ट्रीय पर्व पर याद न करना सिर्फ एक परिवार का अनादर नहीं है, बल्कि यह सवाल हमारी राष्ट्रीय चेतना पर है कि हम अपनी जड़ों को कितनी जल्दी भूल जाते हैं। इस 15 अगस्त को जब ध्वजारोहण हो और परेड की सलामी ली जाए, तब मंच पर एक खाली कुर्सी रामसिंह परिहार के नाम की भी रखी जाए। उस कुर्सी पर उनके बेटे मलखान सिंह और 90 वर्षीया पत्नी विमला सिंह को ससम्मान बैठाया जाए। ताकि आने वाली पीढ़ी को यह अहसास हो सके कि आजादी सिर्फ भाषणों और नारों से नहीं, बल्कि रामसिंह जैसे अनाम नायकों के त्याग और खून से हासिल हुई थी।