
90% जलने के बावजूद ध्यान में लीन रही साध्वी, इस तरह ली समाधि
छतरपुर/ अकसर हमने अपने बड़ों से सुना है कि, सच्चा भक्त सब कुछ त्याग कर अपने ईश्वर की भक्ति में लीन होता है। अपनी साधना के दौरान उसे दुनिया, जीवन और शरीर के होने का अहसास भी नहीं रहता। कहते हैं इस दौरान एक भक्त और उसका ईश्वर आमने सामने होते हैं, यही कारण है कि, एक भक्त को दुनिया में होने वाले किसी भी घटनाक्रम की कोई खबर नही रहती। हालांकि, हम में से कई लोग ये सोचते हैं कि, नानी-दादी द्वारा बताई गई ये बातें महज कहानी मात्र हैं, क्या कोई व्यक्ति किसी तरफ इस तरह ध्यान लगा सकता है कि जहां वो है, वहां कि उसे खबर ही ना रहे? लेकिन, मध्य प्रदेश के छतरपुर में ईश्वर से भक्ति और साधना की एक ऐसी अनोखी मिसाल सामने आई, जिसने ये सिद्ध कर दिया कि, भगवान की साधना में सच्चा भक्त इस कदर लीन हो जाता है कि, उसे दुनिया की खबर ही ना रहे।
डॉ.ने कहा जब तक 90% जल चुकी थीं साधवी
रविवार काे जिले के नैनागिर तीर्थ में जैन साध्वी की धर्म के प्रति अटूट निष्ठा और समर्पण का एक ऐसा सत्य सामने आया, जिनसे भी उसे सुना वो हैरान रह गया। यहां साधना में लीन जैन साध्वी आर्यिका सुनयमति माताजी सामायिक (साधना) में लीन थीं। इस दौरान उनके नजदीक एक अंगीठी रखी थी, जिसकी चिंगारी भड़कने से उनके कपड़ों में आग लग गई। बढ़ते बढ़ते आग इतनी फैल गई कि, उन्हें आग ने पूरी तरह खुद में समाहित कर लिया। हालांकि, अब तक उनकी साधना संपूर्ण नहीं हुई थी, इसलिए उन्होंने वस्त्रों में आग लगने पर भी किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दी। साधना संपूर्ण होने के बाद ही वो अपने स्थान से उठीं इस दौरान वहां अन्य श्रावक पहुंच चुके थे, जिन्होंने साधवी पर लगी आग बुझाई और तुरंत शहर के भाग्योदय अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने बताया कि, वो 90 फीसदी से ज्यादा जल चुकी है।
साधना में लीन थीं और...
साध्वी आर्यिका सुनयमति माताजी का ईश्वर के प्रति यही समर्पण उनकी समाधि मरण का भी माध्यम बना। पूरी तरह आग से झुलस चुकी साध्वी आर्यिका सुनयमति माताजी ने समाधि लेने की इच्छा जताई अाैर रविवार सुबह 5:30 बजे उनका समाधि मरण हाे गया। जानकारी के मुताबिक, साधवी अपने तय नियम के तहत शुक्रवार शाम साधना के लिए अपने कक्ष में चटाई लपेट कर बैठ गईं। वे 45 से 50 मिनट की साधना कर चुकी थीं, तभी एक श्राविका ने अंगीठी में कुछ अंगारे रखकर कमरे के बाहर रख दिए, ताकि माता जी के कक्ष में कुछ गर्मी उत्पन्न हो सके। हालांकि, तभी श्राविका को कोई जरूरी काम याद आ गया, जिसके चलते वो वहां से उठकर चली गई।
तभी तेज हवा से पर्दे ने आग पकड़ ली, जिसके नजदीक बिछी साध्वी की चटाई भी जलने लगी। चूंकि उनकी साधना की अवधि बची हुई थी इसलिए उन्हें इस घटना के बारे में पता ही नहीं चल सका। कुछ ही देर में आग साध्वी के कपड़ों में भी फैल गई। कुछ देर बाद जब उनकी साधना की अवधि पूरी हुई, उन्होंने चटाई को शरीर से अलग करने का प्रयास किया। हालांकि, तब तक उनकी खाल का बहुत सा हिस्सा जलकर शरीर से अलग हो चुका था। अस्पताल में समाधि की इच्छा जताने के करीब 30 घंटे बाद उन्होंने समाधि ली। उनका डाेला रविवार को भाग्योदय के सामने की जमीन पर ले जाया गया। यहां मुक्तिधाम में विनयांजलि सभा में लाेगाें ने आर्यिका सुनयमति माताजी के जीवन पर आधारित कई दृष्टांत सुनाए।
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आचार्यश्री विद्यासागर महाराज से लिया था ब्रह्मचर्य व्रत
मुनिसेवा समिति के सदस्य मुकेश जैन ढाना ने बताया कि आर्यिका सुनयमति माताजी ने 39 साल पहले 16 अगस्त 1980 को आचार्यश्री विद्यासागर महाराज से मुक्तागिरी में ब्रह्मचर्य व्रत लिया था। 6 जून 1997 को उन्हें आर्यिका दीक्षा रेवा तट नेमावर में आचार्यश्री विद्यासागर महाराज ने दी थी।
Published on:
30 Dec 2019 03:27 pm
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