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Navratri 2022: पर्वत के शिखर पर है मां बंबर वैनी का मंदिर, आप भी करें दर्शन

Navratri 2022: 500 फीट ऊंचे पर्वत पर 360 सीढ़ियां पार करने पर मिलते हैं मां बंबर वैनी के दर्शन, चट्टान पर स्थित कुंड में लेटी मुद्रा में माता बंबर वैनी

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छतरपुर/लवकुशनगर। 500 फीट ऊंचे विशाल पर्वत शिखर पर विराजमान माता बंबर वैनी बुंदेलखंड क्षेत्र के प्रसिद्ध सिद्धतीर्थ स्थलों में से एक एवं लाखों लोगों की श्रृद्धा और आस्था का केंद्र है। 360 सीढिय़ां चढ़कर श्रृद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं।

लवकुशनगर के बीचों बीच स्थित बंबरवैनी माता का पर्वत एवं उसकी जुड़ी बावनवैणी पर्वत श्रंखला पूरे नगर के पर्यावरण को संतुलित बनाने एवं प्राकृतिक आपदाओं से बचाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। यही कारण है कि नगर प्राकृतिक आपदाओं से पूरी तरह महफूज है। नगर के बीचों बीच विशाल पहाड़ के उत्तुंग शिखर पर पाषाण शिला पर एक छोटे से कुंड विवर से प्रकट होने के कारण ही इन्हें विवरवैनी, बाद में अपभ्रंश होकर बंबरवैनी नाम मिला। नवरात्रि के अवसर पर श्रृद्धालुओं का सैलाव उमड़ रहा है।

माता बंबरवैनी का इतिहास त्रेता युग से जुड़ा हुआ है। पहाड़ पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम भी है, किवदंती के अनुसार भगवान श्रीराम द्वारा माता सीता का निष्कासन किए जाने के बाद वह यहां बाल्मीकि आश्रम में रहीं। यहां आश्रम में ही लव-कुश का जन्म हुआ। मंदिर के नीचे गुफा में माता की रसोई भी जीर्णशीर्ण हालत में है। इसकी जीवंत गवाही पहाड़ के नीचे स्थित लवकुश का मंदिर भी देता है। माता सीता को महर्षि बाल्मीकि ने वन देवी नाम दिया था। लोग कहते हैं कि वन देवी का अपभ्रंश होकर बंबरवैनी हो गया। माता बंबरवैनी को माता सीता का रूप माना जाता है।

प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. काशीप्रसाद त्रिपाठी की पुस्तक बुंदेलखंड का वृहद इतिहास में उल्लेख है कि स्वप्न मिलने पर तत्कालीन पन्ना महाराज हिंदूपत ने 1758-76 ईश्वी के मध्य माता बंबर वैनी के मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर के अंदर छोटे कुंड में लोग श्रृद्धापूर्वक दूध, पुष्प व बताशा अर्पित करते हैं। लवकुशनगर के बीचों बीच विशाल पहाड़ के उत्तुंग शिखर पर एक चट्टान छोटे से कुंड झ्रझ्र/’’विवर अर्थात छिद्र’ में माता बंबरवैनी लेटी मुद्रा में प्रकट हुई थीं। छतरपुर जिला मुख्यालय से लवकुशनगर 55 किलोमीटर दूर है। नवरात्रि में माता का हर दिन विशेष श्रंगार, भोग लगाया जाता है। सुबह व शाम विशेष भोग लगाया जाता है।