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ARTIST: खलनायक बनकर बंगाल 1947 में नजर आएंगे छिंदवाड़ा के विक्रम

हिन्दी फिल्म बंगाल 1947 आज देश भर में होगी रिलीज

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ARTIST: खलनायक बनकर बंगाल 1947 में नजर आएंगे छिंदवाड़ा के विक्रम

ARTIST: खलनायक बनकर बंगाल 1947 में नजर आएंगे छिंदवाड़ा के विक्रम

छिंदवाड़ा. अगर आप काबिल है तो सफलता जरूरी मिलेगी। इसलिए हमेशा खुद को काबिल बनाई। इसके अलावा हर इंसान को खुद पर विश्वास होना जरूरी है। आपमें सीखने की ललक हमेशा होनी चाहिए। यह बातें हिन्दी फिल्म ‘बंगाल 1947’ में अहम किरदार में नजर आने वाले छिंदवाड़ा के पटपड़ा गांव निवासी 27 वर्षीय विक्रम टांडेकर ने कही। फिल्म शुक्रवार को रिलीज हो रही है। विक्रम ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि एक समय था जब वे काम के लिए भटकते थे, लेकिन उन्होंने प्रयास नहीं छोड़ा। रोज सीखते रहे और आज एक के बाद एक काम मिल रहा है। उन्होंने बताया कि फिल्म बंगाल 1947 छिंदवाड़ा सहित देश के कई सिनेमाघरों में रिलीज होगी। इस फिल्म में वे विलेन का किरदार निभा रहे हैं। पूरी फिल्म की शूटिंग छत्तीसगढ़ में हुई है। फिल्म विभाजन एवं इंसानियत को लेकर बनाई गई है। इस फिल्म में देवोलीना भट्टाचार्जी, अंकुर अर्माम, ओंकारदास माणिकपुरी, आदित्य लखिया, सौहेला कपूर सहित फिल्मी जगत के मशहूर सितारे हैं।


ऐसे मिला काम
विक्रम बचपन से ही एक कलाकार बनना चाहते थे। पढ़ाई में भी अव्वल थे। छिंदवाड़ा में उत्कृष्ट विद्यालय में ही उनकी पढ़ाई हुई। सन 2014 में ओम मंच पर अस्तित्व नामक नाट्य संस्था से जुड़ गए और अपने कला को निखारने लगे। इसके बाद उन्होंने दिल्ली, जयपुर में अभिनय की बारीकियां सीखी। वर्ष 2019 में चयन अकादमी ऑफ थिएटर आट्र्स मुंबई यूनिवर्सिटी में हो गया। उन्होंने अभिनय का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद वे फिल्म इंडस्ट्री में काम की तलाश करने लगे। काफी मेहनत के बाद प्रसिद्ध डायरेक्टर अकाशादित्य लामा की नजर उन पर पड़ी। उन्होंने फिल्म बंगाल 1947 में सेकंड लीड के लिए विक्रम को चुन लिया। फिल्म डेढ़ साल में बनकर तैयार हो चुकी है और शुक्रवार को रिलीज हो रही है।
इस दौरान विक्रम को दो वेब सीरिज सहित अन्य शॉर्ट फिल्मों में भी काम करने का मौका मिला है।


परिवार ने पहले किया था मना
विक्रम के पिता रखलाल टांडेडर किसान हैं। माता सुनीता टांडेकर गृहिणी हैं। तीन भाईयों में वे सबसे छोटे हैं। विक्रम ने बताया कि वे पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहे। इसलिए पिता यह चाहते थे की सरकारी नौकरी करूं, लेकिन मुझे कलाकार बनना था। मैंने पिता से कहा कि अगर मैं नौकरी कर भी लूं तो भी सुकून नहीं मिलेगा। इसके बाद वे मान गए और मुझे मुंबई जाने की इजाजत दे दी। छोटे से गांव से निकलकर बड़ा सपना देखा और फिर उसे पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत की। अटूट दृढ़ संकल्प और अपने सपनों की निरंतर खोज के साथ, सिनेमा की अत्यधिक प्रतिस्पर्धी दुनिया में अपनी जगह बनाई।