
Cancer Treatment
छिंदवाड़ा/ तामिया में कैंसर के इलाज के लिए वनौषधियों की पहचान कर उनके दवाओं में उपयोग के लिए प्र-संस्करण इकाई लगाए जाने के मुख्यमंत्री कमलनाथ के सुझाव पर निजी कम्पनियां अमल कर लें तो इस इलाके की तस्वीर बदल सकती है। पूरे क्षेत्र में इस लाइलाज रोग को मात देने के लिए मालाकंद और सेवनाग जैसी जड़ी-बूटियां जगह-जगह मौजूद हैं। प्रोसेसिंग यूनिट लगाए जाने से भारिया आदिवासी औषधियां खोजकर जंगल से लाएंगे तो उनकी आय में वृद्धि होगी। रोजगार का यह नया केंद्र बन जाएगा।
एक दिन पहले भोपाल में मुख्यमंत्री ने कुछ उद्योगपतियों के साथ चर्चा कर उन्हें तामिया की कैंसर से राहत देने वाली वन औषधियों पर ध्यान केन्द्रित करने कहा था। इसके बाद तामिया, पातालकोट समेत आसपास के इलाकों से जुड़े वैद्यों से चर्चा की गई तो यह पता चला कि सतपुड़ा की वादियों में बसे इस क्षेत्र में 48 प्रकार के कैंसर रोग को मात देने वाली जड़ी बूटियां मौजूद हैं। ये औषधियां वैद्य और व्यवसायियों के माध्यम से उत्तर भारत में दिल्ली, पंजाब, राजस्थान तो दक्षिण भारत में महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और केरल तक पहुंचती हंै। तामिया की कुछ औषधियों को श्रीलंका तक पहुंचाया गया है। वैद्यकीय जानकार बताते हैं कि तामिया सीजन की औषधियां दूसरों इलाकों से इसलिए ज्यादा मारक हैं क्योंकि आदिवासी इलाकों में यूरिया का इस्तेमाल न के बराबर होता है। इसका प्रभाव जंगल में नहीं आ पाता। इसके चलते रोगी इसके सेवन से जल्द ठीक हो जाते हैं। यही औषधीय गुण तामिया की पहचान है। वन औषधियों की प्रोसेसिंग यूनिट से तामिया को वैश्विक पहचान भी दिलाई जा सकती है।
ये औषधियां हैं कैंसर के इलाज में कारगर
तामिया में जड़ी-बूटियों के जानकार वन विभाग के कर्मचारी सुखदेव खरपुसे बताते हैं कि तामिया, पातालकोट, देलाखारी, सांगाखेड़ा समेत आसपास के इलाकों में कैंसर को मात देनेवाली वन औषधियां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इनमें मालाकंद (वन सिंघाड़ा), सेवनाग, सोलापाठा, ईश्वर मूल की जड़-पत्ती, सुकरकंद, खटवा के कंद, कलपारी, बेचांदी, लक्ष्मण कंद, भस्म कंद, हजारी गुलाब की पत्ती, गिलोय आदि औषधियां हंै। वे कैंसर रोगियों को ये औषधियां लम्बे समय से दे रहे हैं। इसका असर प्रभावकारी है। कुछ औषधियां को जापान और ब्राजील से लाकर लगाया गया है।
सीएम साहब इधर भी..चार साल से बंद पड़ा अगरबत्ती का प्लांट
मुख्यमंत्री ने भोपाल में पूरे प्रदेश में अगरबत्ती का प्लांट शुरू करने पर जोर दिया है लेकिन उनके गृह नगर छिंदवाड़ा में भरतादेव में बना अगरबत्ती का प्लांट चार साल से बंद पड़ा है। इस केंद्र में करोड़ों रुपए की मशीनें कबाड़ में तब्दील होकर धूल खा रहीं हैं। वन विभाग की लापरवाही और उदासीनता के चलते तीन करोड़ रुपए का यह प्रोजेक्ट दम तोड़ चुका है। पूर्व वनमण्डल के रिकॉर्ड बताते हैं कि वर्ष 2006 में तीन करोड़ रुपए कृषि मण्डी निधि से भरतादेव के इस हर्बल प्रोसोसिंग प्लांट के लिए मंजूर कराए गए थे। इसमें 80 लाख रुपए प्रशिक्षण केंद्र और हर्बल डिस्टीलेशन प्लांट भवन के नाम पर खर्च किए गए। दो करोड़ रुपए की मशीनें हर्रा-बहेड़ा की प्रोसेसिंग के लिए खरीदी। कुछ समय तक काम भी किया। फिर उत्पाद बिक्री न होने के चलते उसे बंद भी कर दिया। प्लांट में 60 लाख रुपए का तैयार उत्पाद सड़ गया है। एक लाख रुपए का कोयला और प्लांट के अंदर मशीनें अलग कबाड़ बन रही है। प्लांट न चलने से वन अधिकारियों ने इसकी बिजली भी कटवा दी।
Published on:
01 Sept 2019 12:33 pm
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