
Kanak bihari maharaj: कमोद सिंह से बन गए कनक बिहारी महाराज, महज 11 वर्ष थी उम्र
छिंदवाड़ा. मप्र के विदिशा जिले के नटेरन तहसील के खैराई गांव के संपन्न मालगुजार परसराम रघुवंशी के घर पांचवीं संतान के रूप में कमोद सिंह का जन्म हुआ था जो बाद में कनक बिहारी महाराज कहलाए। कहा जाता है कि गांव के बाहर रहकर तपस्या कर रहे संत श्री सीताराम दास के सत्संग प्रभाव से उन्होंने 11 वर्ष की आयु में घर त्याग दिया। भगवान के दर्शन पाने की ललक में निकल पड़े और हौशंगाबाद पहुंच गए। उन्होंने अपने साथ लाए सूट व सांसारिक वस्तुओं को मां नर्मदा जी में विसर्जित कर दिया। कमलदास महाराज की सेवाकर कृपा पात्र बने और उनका सानिध्य प्राप्त कर तप की राह पकड़ ली। इसके बाद उन्होंने राजस्थान के जंगलों में तीन वर्ष तक कठिन तप किया। आहार रूप में जंगली कंद मूल व पान पत्ते व धूनी की राख से जीवन यापन किया। वह जहां भी जाते वहां मंदिर का निर्माण कराकर ईश्वर भक्ति की अलख जगाते थे। वे राजस्थान से जनकपूर होते हुए बिहार पहुंचे। यहां भी उन्होंने लोगों को तीन वर्ष तक धार्मिकता का पाठ पढ़ाया। वे कहते थे कि धन होते हुए भी अपने लिए उपयोग न करो, परमार्थ में लगाओ। यही तो त्याग है। जीवन में त्याग वैराग्य दुर्लभ है। प्रत्येक को एक दिन जीवन को त्यागना है।
निधन की खबर सुनकर हर कोई स्तब्ध
‘यज्ञ सम्राट’ के रूप में ख्याति प्राप्त महंत कनक बिहारी दास महाराज के निधन की खबर सुनकर छिंदवाड़ा में उनके हजारों शिष्यों में शोक की लहर दौड़ गई। उल्लेखनीय है कि बरमान से छिंदवाड़ा लौट रहे महंत कनक बिहारी दास (80) का सोमवार को सुबह नरसिंहपुर के समीप सडक़ हादसे में निधन हो गया। चौरई विकासखंड प्रसिद्ध श्रीराम जानकी मंदिर लोनीबर्रा से उनका गहरा लगाव था। उन्होंने यहां आश्रम बनवा रखा है। कनक बिहारी रघुवंशी समाज के गौरव कहलाते थे। महाराज मूलत: विदिशा के रहने वाले थे। वे लगातार विदिशा, गुना और अयोध्या में विभिन्न धार्मिक आयोजनों में शामिल होते थे। उनके हजारों शिष्य हैं, जो महाराज के निधन की खबर लगते ही छिंदवाड़ा रवाना हो गए। देर रात तक शिष्यों के आने का सिलसिला जारी था।
अयोध्या में महायज्ञ की कर रहे थे। अगले वर्ष वे अयोध्या में 9009 कुंडीय श्रीराम महायज्ञ कराने जा रहे थे। वर्ष 2021 में श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट को 1.11 करोड़ रुपए की राशि का चेक सौंपा था।
लोनीबर्रा में है आश्रम
चौरई विकासखंड के लोनीबर्रा में करीब 25 एकड़ में कनक बिहारी महाराज का आश्रम है। यहां वे शिष्यों को यज्ञ शास्त्र में पारंगत करते थे। महाराज ने आश्रम में भव्य श्रीराम जानकी मंदिर भी बनवाया है, जिसे कनक भवन नाम दिया गया है। उन्हें जूना अखाड़ा ने यज्ञ सम्राट की उपाधि दी थी। वे दिगम्बर अखाड़ा के सदस्य भी थे।
ग्यारह वर्ष की उम्र में किया था घर का त्याग
महंत कनक बिहारी दास महाराज के निधन से हर कोई स्तब्ध है। वे जहां जाते थेए वहीं यज्ञ कराते थे और यही कारण है कि महंत कनक बिहारी दास का नाम यज्ञ सम्राट के रूप में जाना जाने लगा था। महंत कनक बिहारी महाराज के गृहस्थ जीवन के भतीजे और जीव जंतु कल्याण बोर्ड के सदस्य राम रघुवंशी ने बताया कि महंत विदिशा के खैराई गांव के रहने वाले थे। वे पांच भाइयों मेंं सबसे छोटे थे और 11 वर्ष की उम्र में उन्होंने राम भक्ति में लीन होकर घर का त्याग कर दिया था। वे ज्यादातर समय फलाहार पर रहते थे। छिंदवाड़ा में उनका गुरु आश्रम है। यहीं पर उन्होंने संन्यास लिया था। बताया जाता है कि वे वर्ष 1980 में चांद के समीप कुलबेहरा एवं पेंच नदी के संगम तट पर पहुंचे और वहीं तपस्या करने लगे। वे अगर खाना भी खाते थे तो खुद ही बनाते थे। रघुवंशी समाज को जोडऩे में उनका विशेष योगदान रहा है। सोमवार शाम को अंतिम दर्शन के लिए उनका पार्थिव शरीर छिंदवाड़ा के रघुवंशम लॉन और फिर चांद स्थित आश्रम ले जाया गया। देर शाम तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि उनका अंतिम संस्कार किस विधि से किया जाएगा। इस संबंध में अंतिम निर्णय मंगलवार को संत समाज लेगा।
Published on:
18 Apr 2023 06:15 pm
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