
Sharadiya Navratri 2023: पहाड़ियों की तलहटी पर विराजित हैं सिंह पर सवार आशावारी माता, प्रदेशभर से पैदल चलकर आते हैं भक्त
छिंदवाड़ा. जिले में स्थित मां दुर्गा मंदिरों की ख्याति दूर-दूर तक फैलती जा रही है। मान्यता है कि इन मंदिरों में सच्चे मन से जो कामना की जाती है वह पूरी हो जाती है। एक तरफ हिंगलाज मंदिर तो दूसरा कपुर्दा माता की मंदिर की विशेष ख्याति है। जुन्नारदेव के पास अंबाड़ा में स्थित माता हिंगलाज मंदिर के दर्शन के लिए नवरात्र में हजारों की संख्या में भक्त उमड़ रहे हैं। कहा जाता है कि मां दुर्गा की 51 शक्तिपीठों में सबसे पहला शक्तिपीठ पाकिस्तान के बलूचिस्तान में है। मां हिंगलाज वहां मस्तिष्क के रूप में विद्यमान है। मां सती का मस्तिष्क दो जगहों पर गिरा था, एक बलूचिस्तान में गिरा और एक राजस्थान में। बलूचिस्तान अब पाकिस्तान में है और राजस्थान में विराजी मां हिंगलाज की प्रतिमा को कुछ भक्त वर्षों पहले छिंदवाड़ा जिले में ले आए थे। बताया जाता है कि राजस्थान के राजा काठियावार क्षत्रिय कुल देवी के रूप में माता हिंगलाज की पूजा करने लगे तथा कालांतर में उनके वंशज जीविकोपार्जन के लिए छिंदवाड़ा में माता की प्रतिमा सहित आ गए और विधिवत पूजन कर बडक़ुही नंबर दो त्रिवेदी माइन के पास मूर्ति को स्थापित कर दिया गया। बताया जाता है कि प्रतिमा पाताललोक से स्वयं प्रगट हुई थी। वर्ष 1907 के आसपास अंग्रेजों ने खदान क्षेत्र के पास सीआरओ कैम्प का निर्माण कराने के लिए मूर्ति का हटाने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहे। इसके बाद माता हिंगलाज ने अंग्रेज को स्वप्न में मूर्ति नहीं हटाने की चेतावनी दी। लेकिन अंग्रेज ने मूर्ति को हटाने के लिए दोबारा निर्देश दे दिए। इस बात से माता नाराज हो गई तथा क्षेत्र के घने जंगलों के बीच इमली के पेड़ के नीचे आ गई। इस संबंध की सूचना सपने में पुरुषोत्तम ठेकेदार को दी। इसके बाद ठेकेदार ने तूफानी बाबा को साथ लेकर माता को खोजकर छोटी सी मढिय़ा का निर्माण करवाया। छिंदवाड़ा में मां हिंगलाज का मंदिर काफी प्रसिद्ध है। दूर-दराज से लोग माता के दर्शन करने आते हैं। मान्यता है कि मां के दर पर जो कोई आया वह खाली हाथ नहीं गया। सच्चे मन से मांगी मुराद माता पूरी करती हैं।
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भक्तों की मनोकामना पूरी करती हैं मां षष्ठी
छिंदवाड़ा. मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर दूर सिवनी रोड पर चौरई से पांच किमी आगे कपुर्दा गांव में षष्ठी माता का मंदिर स्थित है। मंदिर में हर मंगलवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने के लिए आते हैं। मान्यता है कि मां का दर्शन करने मात्र से ही भक्तों की सारी मनोकमाएं पूरी होती है। मान्यता है कि यहां बच्चों का सूखा रोग भी ठीक हो जाता है। मंदिर की प्रसिद्धि के चलते यहां दूर-दूर से लोग दर्शन करने के लिए आते है। कहा जाता है कि सन् 1923 में कुएं से मां की प्रतिमा अवतरति हुई थी, इनमें से कुछ छह मूर्तियां निकली थीं, तीन एक साथ और तीन अलग-अलग मूर्तियां थीं। मंदिर के ट्रस्टी के अनुसार उनकी दादी को सपना आया था कि खेत के कुएं में देवी की मूर्ति है, जिसके बाद सन 1923 में उनके दादाजी ने कुएं को साफ कराया तो 6 देवी की प्रतिमाएं निकली। इसके बाद ही प्रतिमाओं का नाम षष्ठी माता रखा गया। मंदिर में दूर-दूर से लोग माता के दर्शन करने के लिए आते हैं। मंदिर में जिन बच्चों को सूखा रोग हो जाता है, उन बच्चों के कपड़े उतार के मैली देवी के पास रख दिए जाते हैं। बच्चों को पानी से नहलाया जाता है या पानी लोटे से उतार दिया जाता है। उसके बाद उनके रोग अपने आप ही ठीक हो जाते हैं। मंदिर परिसर में हर मंगलवार को मेला लगता है। जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ होती है। नवरात्रों में हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।
Published on:
22 Oct 2023 03:05 pm
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