
Rangmanch: रंगमंच दिवस पर रंगकर्मियों ने कह दी यह बात, इसकी है जरूरत
छिंदवाड़ा. रंगमंच जीवन के विविध रंगों को मंच पर प्रस्तुत करने की जीवंत विधा है। रंगमंच पर जब समाज की दशा को जीवंत किया जाता है तो दर्शक उसके साथ आसानी से जुड़ जाता है। रंगमंच समाज का आइना ही नहीं बल्कि परिवर्तन का सशक्त औजार भी है। लंबे समय तक देह, दिल व दिमाग पर मेहनत करने के बाद कलाकार पैदा होता है। और ऐसे ही कई कलाकार हमारे छिंदवाड़ा ने पैदा किए हैं। हमारे जिले के रंगकर्मियों ने राष्ट्रीय स्तर पर धमक जमाई है। इसमें कोई संदेश नहीं कि छिंदवाड़ा में रंगकर्म को काफी सराहा जाता है और भविष्य भी उज्जवल है। यहां न केवल अच्छे कलाकार हैं बल्कि अच्छे दर्शक भी हैं। छिंदवाड़ा रंगमंच के मामले में शानदार और गौरवशाली इतिहास समेटे हुए है। 50 के दशक से शुरु नाटकों का सिलसिला बदस्तुर जारी है। इन सबके बावजूद भी छिंदवाड़ा में सबसे बड़ी जो कमी है वह है ऑडोटोरियम की और रंगकर्मियों के प्रोत्साहन की। आज विश्व रंगमंच दिवस है। हमने जिले के रंगकर्मियों से बातचीत की। उनका कहना था कि शहर में जल्द ही ऑडोटोरियम का निर्माण होना चाहिए। ऑडोटोरियम होगा तो निरंतरता बढ़ेगी और लोग जुड़ते जाएंगे। अच्छे कलाकार के सामने जब रोजी-रोटी का संकट आता है तो वह रंगमंच छोडकऱ नौकरी तरफ बढ़ जाता है। एक रंगकर्मी को सरकार मदद करे तो रंगकर्म खिल जाएगा।
इनका कहना है...
जिले के साझा रंगकर्म की प्रशंसा देश के प्रतिष्ठित रंगपुरोधाओं ने भी की है, लेकिन आर्थिक अभावों तथा कोरोना काल ने कलाकारों की कमर ही तोडकऱ रख दी है। एक बार फिर खुले मन से समरसता के साथ कार्य करने और मिलजुल कर सर्वसुविधायुक्त रंग भवन की मांग पुन: उठाने की जरूरत है।
विजय आनंद दुबे, वरिष्ठ रंगकर्मी
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मेरी 22 वर्ष की रंगयात्रा में मैंने ये समझा है कि छिंदवाड़ा में रंगकर्म की असीम संभावनाएं हैं। हमारे शहर की सबसे बड़ी खासियत यहां के कलाप्रेमी हैं जो रंगकर्म के लिए बहुत सहयोगी हैं। प्रशासन की इस विधा के प्रति उदासीनता जरूर चिंता का विषय है। जिस शहर में 50 वर्षों से ज्यादा का रंगकर्म का इतिहास हो वहां ऑडिटोरियम का न होना बेहद दुखद और निंदनीय है। छिंदवाड़ा के रंगकर्मी खुले मैदानों, स्कूलों और पार्को में रिहर्सल और मंचन करने के लिए मजबूर हैं। इन समस्याओं के बाद भी हम सभी रंगकर्मी रंगकर्म की मशाल को जलाए हुए हैं।
सचिन वर्मा, वरिष्ठ रंगकर्मी
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ग्रामणी अचंलों में नाटक प्रस्तुतियों से अहसास हुआ कि यहां रंगमंच की समझ अधिक लोगों में है। संसाधनों की वृद्धि से छिंदवाड़ा रंगमंच को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत कर सकते हैं। हम रंगकर्मियों को आवश्यकता है तो बस एक ऑडोटोरियम की और प्रोत्साहन की। यह दोनों मिल जाएंगे तो फिर न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हमारे कलाकार प्रतिभा का लोहा मनवाएंगे।
ऋषभ स्थापक, युवा रंगकर्मी
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छिंदवाड़ा रंगमंच के मामले में शानदार और गौरवशाली इतिहास समेटे हुए है। 50 के दशक से शुरु रंगमंच का कारवां लगातार जारी है। इन सबके बावजूद छिंदवाड़ा में ऑडोटोरियम न होना समझ से परे है। अगर प्रशासन रंगकर्मियों को प्रोत्साहित करे और ऑडोटोरियम की सुविधा हो जाए तो फिर रंगकर्म के क्षेत्र में आने वाला कल और भी शानदार होगा।
डॉ. पवन नेमा, वरिष्ठ रंगकर्मी
Published on:
27 Mar 2022 06:39 pm
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