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पातालकोट के हर्राकछार का गांव सूखाभाण्ड, जहां मुश्किल से मिलता है एक गुण्डी पानी

दिन भर दूरदराज की झिरिया के किनारे बैठ रही महिलाएं, फिर पानी लेकर पहाड़ी रहवास में चढऩे की मजबूरी

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तामिया विकासखंड के पातालकोट की ग्राम पंचायत हर्राकछार के ग्राम सूखाभाण्ड में रहनेवाली महिलाओं के लिए इस समय पानी बेशकीमती है। वे भरी दोपहरी में दूरदराज की झिरिया में पहुंचकर अपनी गुण्डी में पानी भरने का इंतजार कर रही है। यहां महिलाएं धीरे-धीरे बाल्टी में रस्सी बांध कर उसे खींच रही है। साथ ही प्रशासन को गालियां भी दे रही है, जिसने अब तक उनके गांव में पेयजल का इंतजाम नहीं किया है। जिससे मजबूरी में घर से निकलकर उन्हें झिरिया में आने मजबूर होना पड़ा है।


इस गांव में मकान गिनती के 23 है, जिनमें रहने वाले की संख्या 110 है। महिलाएं शांति भारती, सुमरवती, सुनीता, राजुल और पुष्पा भारती बताती है कि वे जन्म से ही नाले में बनी झिरिया का दूषित पानी पी रहे हैं। हैंडपम्प के अभाव में जितना पानी रातभर में झिरिया में जमा हो पाता है, उतने से ही पूरे गांव को गुजारा करना पड़ता है।


अभी गांववालों ने चंदा कर यहां सीमेंट फाड़ी से झिरिया को आसपास पक्का किया है। इस गांव में कुआं नहीं है। मजबूरी में झिरिया से पानी पीना मजबूरी है। उनके मुताबिक ऐसा नहीं है कि ग्रामवासियों ने मिलकर कलेक्टर ऑफिस में आवेदन नहीं किया है। फिर भी अभी तक कोई अधिकारी नहीं आए और पानी का वैकल्पिक इंतजाम नहीं किया है।


यह समस्या केवल दो-चार माह की नहीं है बल्कि पूरे साल भर इंतजाम न होने का खामियाजा भुगतना पड़ता है। ग्राम की पंच समलवती भारती का कहना है कि अब जब झिरिया का पानी सूख जाएगा तब उन्हें पानी लाने डेढ़ किमी दूर पातालकोट के नीचे पानी लाने जाना पड़ेगा। पीएचई के अधिकारियों ने भी कभी इस अंचल की पेयजल समस्या सुलझाने ध्यान नहीं दिया है।

झिरिया में एकत्र होता है दूधी नदी का पानी

पातालकोट में पानी का मुख्य स्रोत दूधी नदी है, जो पहाड़ों से नीचे गांवों में बहती है। पानी एक चट्टान पर इक_ा होता है जिसे 'झिरिया' के नाम से जाना जाता है। मानसून के दौरान, पानी गंदगी और कीचड़ लेकर आता है। जिससे इसे पीना असुरक्षित हो जाता है। वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण, ग्रामीण इस प्रदूषित पानी का उपयोग करने के लिए मजबूर हैं।
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