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शिक्षक की विदाई ऐसी कि पूरा गांव रो पड़ा, रथ में बैठाकर किया विदा

ग्रामीणों, छात्रों और अभिभावकों ने उन्हें आंखों में आंसू और दिल में सम्मान लिए ऐसी विदाई दी, जिसकी मिसाल शायद ही कहीं और देखने को मिले। अमूमन सेवानिवृत्ति समारोह सादगीपूर्ण होते हैं, लेकिन धोबीवाड़ा ग्रामवासियों ने इसे उत्सव में बदल दिया।

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जिले के तामिया विकासखंड के छोटे से गांव धोबीवाड़ा में बुधवार को एक ऐसा भावुक और ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला, जो शिक्षा और समर्पण के रिश्ते को हमेशा रखा जाएगा। प्राथमिक विद्यालय धोबीवाड़ा में पिछले 38 वर्ष 10 माह से लगातार सेवारत रहे शिक्षक मेघराज पराडकऱ के सेवानिवृत्त होने पर पूरा गांव रो पड़ा।

ग्रामीणों, छात्रों और अभिभावकों ने उन्हें आंखों में आंसू और दिल में सम्मान लिए ऐसी विदाई दी, जिसकी मिसाल शायद ही कहीं और देखने को मिले। अमूमन सेवानिवृत्ति समारोह सादगीपूर्ण होते हैं, लेकिन धोबीवाड़ा ग्रामवासियों ने इसे उत्सव में बदल दिया। शिक्षक पराडकऱ को विदा करने के लिए गांव में धूमधाम से बारात निकाली गई। उनके लिए विशेष रूप से मंगाए गए रथ को रंग-बिरंगे फूलों से सजाया गया था। जैसे ही शिक्षक रथ पर सवार हुए, बैंड-बाजे की धुन पर ग्रामीणों ने उन्हें घेर लिया। छात्रों से लेकर बुजुर्गों तक हर किसी का गला रुंधा हुआ था। जो उनके प्रति गांव के अटूट प्रेम और कृतज्ञता को दर्शाता था।


इन ग्रामीणों ने बनाया विदाई को यादगार


इस यादगार और ऐतिहासिक विदाई समारोह में हरीश उइके जनपद पंचायत सदस्य, जगदीश धुर्वे पंच, रविशंकर परतेती अध्यक्ष, मेहरवान परतेती, जयराम पंद्रे, ममता उइके, उर्मिला परतेती, उर्मिला कुमार, सन्तोष परतेती, मरदानसा पंद्रे, मनीराम उइके, विजय परतेती सहित समस्त ग्रामवासी और शिक्षकगण मौजूद रहे।


1987 में हुई थी शिक्षक की पोस्टिंग


मेघराज पराडकऱ की पहली पोस्टिंग 1 अक्टूबर 1987 को इसी धोबीवाड़ा ग्राम में हुई थी और उन्होंने अपनी संपूर्ण सेवा, लगभग चार दशक, इसी स्कूल को समर्पित कर दी। इन 38 वर्षों में उन्होंने गांव की कई पीढिय़ों को शिक्षित किया, जिससे उनका रिश्ता केवल शिक्षक और छात्र का नहीं, बल्कि परिवार जैसा बन गया था। विदाई समारोह में स्कूल स्टाफ के साथ-साथ भारी संख्या में ग्राम वासी, छात्र-छात्राएं और अभिभावक शामिल हुए। जनसैलाब की यह उपस्थिति ही इस बात का प्रमाण थी कि शिक्षक ने गांव के दिलों में कितनी गहरी जगह बनाई है। हर किसी की आंखें नम थीं, यह विदाई नहीं, बल्कि परिवार के मुखिया की भावुक विदाई लग रही थी।