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आखिर क्यों दुनियाभर के लोगों की पहली पसंद बनी छिंदवाड़ा के आदिवासियों की ये खास डाइट

आदिवासी दिवस पर विशेष...आदिवासी संस्कृति के करीब है छिंदवाड़ा
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छिंदवाड़ा

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P shanker G

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Updated: 9 Aug 2025, 10:55 AM IST

chhindwara aadiwasi

सदियों से पातालकोट समेत तामिया अंचल में पैदा हो रहा कोदो-कुटकी, समां, रागी आदिवासियों का मूल भोजन रहा है। बदलते वक्त के साथ अब यह शुगर और ब्लड प्रेशर के मरीजों की पसंद बन गया है। आदिवासी संस्कृति छिंदवाड़ा के करीब है। 37 फीसदी आदिवासी वर्ग का दबदबा जिले की आबादी में है। विश्व आदिवासी दिवस नौ अगस्त को अपनी मूल संस्कृति के संवाहक आदिवासी वर्ग को हमें याद करना होगा।

जिले में 37 फीसदी आदिवासी वर्ग का दबदबा

छिंदवाड़ा और पांढुर्ना जिले की 23.76 लाख आबादी में आदिवासी वर्ग करीब नौ लाख की संख्या में मौजूद हैं। कुछ वर्ग सरकारी नौकरियों में है, तो बड़ा वर्ग मजदूरी कर जीवन यापन कर रहा है। आदिवासी संस्कृति जिलेवासियों को कहीं न कहीं प्रभावित करती रही है। इनके भोजन, वस्त्र, आभूषण, मूल जीवन को जीने के संसाधन की झांकी बादलभोई म्युजियम में देखी जा सकती है।

बीपी, शुगर, मोटापा कम करने में सहायक

बीपी, शुगर, मोटापा एवं हृदय रोगियों के लिए ये मिलेट्स वरदान हैं। जिले में कोदो, कुटकी, रागी, कंगनी सहित ज्वार की खेती लगभग 15 हजार हेक्टेयर में होती है, जिससे तैयार व्यंजन एफपीओ के माध्यम से जिले ही नहीं बल्कि प्रदेश एवं देश के अन्य राज्यों तक भी विक्रय किए जा रहे हैं।

आदिवासियों के भोजन हर किसी की पसंद

आदिवासियों के भोजन मक्का की रोटी, टमाटर की चटनी, ज्वार की रोटी, बैगन भर्ता, कुटकी चावल, मिलेट्स के चीले डोसा, रागी सूप, मक्का की भेल, कुटकी की खीर, महुआ की पूड़ी, मक्का का खूद, महेरी एवं बाजरे की खिचड़ी आदि देशी व्यंजन पर्यटकों की पसंद है। चिरौंजी की बर्फी, स्ट्रॉबेरी, शहद, कच्ची घानी का तेल, गुड़ का पावडर एवं कोदो, कुटकी का चावल में रुचि ली जा रही है।

आदिवासी अंचल में है सेहतमंद अनाज

जिले में 37 फीसदी आबादी आदिवासी है। छिंदवाड़ा से लेकर तामिया, जुन्नारदेव, बिछुआ, अमरवाड़ा, हर्रई, परासिया और पांढुर्ना में निवासरत ये लोग सदियों से कोदो कुटकी, जगनी समेत अन्य अनाज और सब्जियां बिना रासायनिक खाद के उत्पन्न कर रहे हैं। इससे उनकी सेहत दूसरे वर्ग की तुलना में बेहतर रही है। एक अनुमान के अनुसार में जिले में प्राकृतिक और जैविक खेती का गैर सरकारी आंकड़ा 45 हजार हेक्टेयर है।