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विश्व मधुमक्खी दिवस…जंगली मधुमक्खी के शहद पर निर्भर, अब निकलेगा व्यवसायिक उत्पादन का रास्ता

किसानों के सामने भोजन उपलब्ध कराना चुनौती, फिर भी भविष्य में बनेगा वृहद उत्पादन का प्रोजेक्ट

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छिंदवाड़ा.वन सम्पदा से भरपूर छिंदवाड़ा जिला इस समय जंगली मधुमक्खी के शहद पर निर्भर है। बालाघाट में देश भर के विशेषज्ञों के मंथन से राय निकली तो जिले में भी व्यवसायिक उत्पादन का रास्ता निकलेगा। इसके लिए निरंतर भोजन उपलब्ध कराना चुनौती जरूर है लेकिन दृढ़ संकल्प से इसे आसान तो बनाना होगा। विश्व मधुमक्खी दिवस 20 मई को मधुमक्खी पालन की संभावनाओं पर विचार तो करना होगा।
जिले का कुल क्षेत्रफल 11815 वर्ग किमी हैं। उसमें वन क्षेत्र 4608.13 वर्ग किमी में हैं। इनमें से सघन वन क्षेत्रों में जंगली मधुमक्खियां पाई जाती है। चट्टान और पेड़ों पर ये मधुमक्खियां छत्ते बनाती है। जिनमें बेहतर गुणवत्ता का शहद होता है। अब इसके खेतों में उत्पादन के प्रयास किए जा रहे हैं। नई तकनीक से मधुमक्खी को इंसानी बस्तियों में पाला भी जा सकता है। जंगलों से शहद का संग्रह लंबे समय से अस्तित्व में है। मधुमक्खियां फूलों के अमृत को शहद में परिवर्तित करती हैं और उन्हें छत्ते में जमा करती हैं। शहद और इसके उत्पादों के बढ़ते बाजार की संभावना के परिणामस्वरूप मधुमक्खी पालन एक व्यवहार उद्यम के रूप में उभर रहा है।
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इनका कहना है...
तामिया समेत आसपास के इलाकों में मौजूद मधुमक्खियां बेहतर शहद का उत्पादन देती है। अर्जुन के पेड़ों के छत्तों का शहद औषधीय होने से इसकी मांग अधिक है। हम इसकी जीआई टैङ्क्षगग का आवेदन कर चुके हैं।
-ईश्वर जरांड़े, डीएफओ पश्चिम वनमण्डल।
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जिले में कृषि क्षेत्र में मधुमक्खियों का पालन और शहद उत्पादन की संभावनाएं है। उन्हें निरंतर भोजन उपलब्ध कराना चुनौती है। बालाघाट कृषि मेला में कृषि अधिकारियों और किसानों का समूह पहुंचाया गया है। यहीं से मंथन से व्यवसायिक उत्पादन का रास्ता तय होगा।
-जितेन्द्र कुमार सिंह, उपसंचालक कृषि।