
मेवाड़ विवि में फर्जीवाड़ा उजागर, पत्रिका फोटो
Mewar University Scam: राजस्थान में सरकारी से लेकर निजी विश्वविद्यालयों में फर्जीवाड़ा थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक के बाद एक विश्वविद्यालयों की अनियमितताएं सामने आ रही हैं। चित्तौड़गढ़ स्थित मेवाड़ विश्वविद्यालय की जांच में गंभीर अनियमितताएं और व्यापक फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है।
जांच समिति की रिपोर्ट में सामने आया है कि विश्वविद्यालय में प्रवेश से लेकर परीक्षा परिणाम तक यूजीसी नियमों का पालन नहीं किया गया। बिना आवश्यक पात्रता जांच के विद्यार्थियों को प्रवेश दिया गया और परीक्षा के बाद भी प्रवेश दर्शाकर डिग्रियां बांटी गईं। विश्वविद्यालय की ओर से संचालित कृषि विस्तार से जुड़े पाठ्यक्रम में भी बड़े स्तर पर अनियमितताएं मिली हैं। शोध उपाधियों के वितरण में भी गंभीर गड़बड़ियां सामने आई हैं। इस पर उच्च शिक्षा विभाग ने विश्वविद्यालय को कारण बताओ नोटिस जारी कर 45 दिन में बिंदुवार जवाब मांगा है।
जांच में सामने आया कि प्रवेश से लेकर परीक्षा परिणाम तक दस्तावेजों का समुचित संधारण नहीं किया गया। विश्वविद्यालय की ओर से “डिप्लोमा इन एग्रीकल्चर एक्सटेंशन सर्विसेज फॉर इनपुट डीलर्स” पाठ्यक्रम में पूरे वर्ष प्रवेश दिए गए और नियमों के विरुद्ध छात्रों को परीक्षा में बैठाया गया। यहां तक कि परीक्षा आयोजित होने के बाद भी प्रवेश देकर उपाधियां प्रदान की गईं।
पाठ्यक्रम संचालन में विश्वविद्यालय ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर एक्सटेंशन मैनेजमेंट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया और अपनी अकादमिक परिषद के निर्णयों को दरकिनार कर प्रमाण पत्र जारी किए। कई पाठ्यक्रमों में छात्रों की संख्या निर्धारित क्षमता से अधिक पाई गई। प्रमाण पत्रों की जांच में भी अनियमितताएं सामने आईं।
पाठ्यक्रम संचालन के दौरान न तो बैच बनाए गए और न ही छात्रों को अनिवार्य फील्ड विजिट कराई गई। छात्रों से निर्धारित 28,000 रुपये शुल्क के स्थान पर अलग-अलग राशि वसूली गई। बीएससी कृषि पाठ्यक्रम के लिए आईसीएआर, उच्च शिक्षा विभाग और कृषि विभाग के तय मापदंडों की पूर्ति नहीं की गई और मान्यता के लिए आवेदन तक नहीं किया गया। शैक्षणिक स्टाफ में भी निर्धारित योग्यता का अभाव पाया गया।
जांच में पाया गया कि विश्वविद्यालय के प्रशासनिक अधिकारियों-प्रो. पी. रामैया, प्रो. वीएनआर पिल्लई, प्रो. वीके वैद्य, प्रो. कौशल किशोर चंदुल, प्रो. केएस राणा और प्रो. आलोक मिश्रा ने अध्यक्ष पद पर कार्य करते हुए नियमों की अनदेखी की। वहीं एम. सुदर्शन, प्रो. गोविंद सिंह, प्रो. वेंकट वीपीआर, बीएल स्वर्णकार, लक्ष्मण रावत, आर. रामास्वामी और डॉ. मायाधर बरीक कुलसचिव पद पर कार्यरत रहे।
इनके कार्यकाल में शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्तियों में यूजीसी मापदंडों का उल्लंघन हुआ। इन्हीं कर्मचारियों को लंबे समय तक उच्च पदों पर रखा गया और इन्होंने गोपनीय अभिलेखों का सही संधारण नहीं किया। परीक्षा अनुभाग से जुड़े डॉ. सैयद असगर, प्रियंका गौतम, अशोक खरोदिया, डॉ. ओम प्रकाश और सुशील शर्मा की भूमिका फर्जी डिग्री वितरण में सामने आई है। एसओजी ने इनकी गिरफ्तारियां भी की जा चुकी हैं।
कुलसचिव जैसे जिम्मेदार पदाधिकारियों की अनुमति के बिना ही डिग्रियों की छपाई जैसे गोपनीय कार्य कराए गए, जिससे उनकी भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई है।
विश्वविद्यालय के शोध विभाग में 425 पीएचडी उपाधियां नियमों के विरुद्ध प्रदान की गईं। विश्वविद्यालय की प्रबंधन समिति की ओर से शोध अवधि बढ़ाने का कोई अनुमोदन नहीं दिया गया, फिर भी अध्यक्ष प्रो. सर्वोत्तम दीक्षित और शोध निदेशक डॉ. चेताली अग्रवाल ने उपाधियां जारी की गईं।
ओपीजेएस विश्वविद्यालय, चूरू में भी फर्जी डिग्री वितरण और प्रवेश में अनियमितताओं की पुष्टि हो चुकी है। सरकार ने वहां प्रशासक नियुक्त कर नए प्रवेश पर रोक लगा रखी है।
वहीं संस्कृत विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेजों द्वारा पांच वर्षों में 1046 अपात्र छात्रों को परीक्षा में बैठाकर प्रमाण पत्र जारी करने का मामला भी सामने आ चुका है, जिसे सरकार ने विधानसभा में स्वीकार किया, लेकिन अब तक दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई है।
Published on:
01 Apr 2026 09:07 am
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