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कागजों में ओडीएफ, हकीकत में खुले में कर रहे शौच

स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के तहत भले ही टारगेट देकर शौचालय निर्माण का काम पूरा होने का दावा करते हुए चित्तौडग़ढ़ जिले को ओडीएफ घोषित कर दिया हो, लेकिन करीब सवा तीन अरब रुपए खर्च करने के बाद भी ग्रामीण अंचल में आज भी लोग खुले में शौच कर ओडीएफ को आईना दिखा रहे हैं।
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चित्तौडग़ढ़ के अरनिया जोशी गांव में अधूरा पड़ा शौचालय निर्माण का कार्य



चित्तौडग़ढ़. स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के तहत भले ही टारगेट देकर शौचालय निर्माण का काम पूरा होने का दावा करते हुए जिले को ओडीएफ घोषित कर दिया हो, लेकिन करीब सवा तीन अरब रुपए खर्च करने के बाद भी ग्रामीण अंचल में आज भी लोग खुले में शौच कर ओडीएफ को आईना दिखा रहे हैं।
जिले में वर्ष २०१२ से शौचालय बनाने का काम शुरू किया गया था। स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय को लेकर जिले में २,६७,२०३ घरों का सर्वे किया गया था। इनमें से मात्र ३३,०८९ घरों में ही शौचालय पाए गए थे। जिले में २,३४,११४ परिवार ऐसे थे, जिन्होंने घरों में शौचालय नहीं बनवा रखे थे। इनमें ४०,७६६ बीपीएल परिवार थे। प्रशासन का दावा है कि जिले में अब तक २६४५२० शौचालय का निर्माण करवाकर ओडीएफ घोषित किया जा चुका है, जो कुल लक्ष्य का सौ प्रतिशत है। यानी प्रशासन की मानें तो वर्ष २०१२ के बेस लाइन सर्वे के अनुसार कोई भी परिवार शौचालय से वंचित नहीं रहा।
सवा तीन अरब रुपए खर्च
पात्र परिवारों को शौचालय निर्माण के लिए स्वच्छ भारत मिशन के तहत १२ हजार रुपए प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान था। प्रशासन ग्रामीण अंचल में कुल २६४५२० शौचालयों के निर्माण का दावा कर रहा है, जिस पर कुल ३ अरब १७ करोड़ ४२ लाख ४० हजार रुपए खर्च होता है। इसका लाभ बीपीएल के साथ हर वर्ग के परिवारों को देने का भी दावा किया गया है। जिले में शौचालय निर्माण पर अरबों खर्च करने के बाद भी सरकार का जो इनके निर्माण के पीछे उद्देश्य था, वह पूरा नहीं हुआ है।
चित्तौड़ शहर में भी खुले में शौच
नगर परिषद आयुक्त नसीम शेख की मानें तो शहरी क्षेत्र में स्वच्छ भारत मिशन के तहत कुल ३४४५ शौचालय बनवाने का लक्ष्य था और यह लक्ष्य पूरा कर लिया गया है, लेकिन शहर के कई इलाकों में अब भी लोग खुले में शौच कर रहे है। इसका एक उदाहरण मधुवन क्षेत्र का धाकड़ मोहल्ला है, जहां लोग खेत पर खुले में शौच करते देखे जा सकते हैं।
इसलिए जरूरी था निर्माण
गांवों की आबादी का बड़ा भाग खुले में शौच को जाता है। मल जल के साथ मिलकर पेयजल को दूषित करता है। खुले में शौच के कारण महिलाओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। खुले में शौच से डायरिया, पीलिया जैसी बीमारियां भी फैलने की आशंका रहेती है।
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जिले में शौचालयों की हकीकत
- जिले में २,३४,११४ शौचालय बनाने का था लक्ष्य
- जिले में लक्ष्य के मुकाबले २६४५२० शौचालयों का निर्माण कराया गया।
- ग्रामीण अंचल में अब भी पचास फीसदी लोग करते हैं खुले में शौच
- कई सरकारी शौचालय भी नहीं है उपयोग योग्य
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शौचालय के नाम पर खोद दिए गड्ढे
निम्बाहेड़ा. रुवच्छ भारत मिशन के नाम पर जहां एक ओर सरपंच व विकास अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र को खुले में शौच मुक्त घोषित कर अवार्ड हासिल कर चुके हैं वहीं कई स्थानों पर हालात पहले जैसे है। पंचायत समिति निम्बाहेड़ा को ओडीएफ के लिए सम्मानित किया गया, लेकिन कई गांव ऐसे हैं जहां अब तक शौचालय या तो बने ही नहीं या उस नाम पर केवल गड्ढे खुदे हुए है। अरनिया जोशी गांव के कई घरों में आज भी शौचालय नहीं हैं और कई अधूरे पड़े है। लोग बरसात हो या सर्दी दिन हो या रात हमेशा ही शौच के लिए जंगल ही जाते हैं। इस गांव को खुले में शौच मुक्त किया हुआ है। यहां कई शौचालय भी बने हुए दिखे। यहां के निवासी दुर्गा भील, पन्ना भील आदि ने बताया कि जो शौचालय बने है, उनकी हालत जर्जर है। छत से पानी टपकता है। ज्यादातर शौचालयों में किसी का दरवाजा नहीं है।

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