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जिन्होंने दी चित्तौड़ को पहचान, उनसे ही हम अनजान

देश में शौर्य का बखान करने के लिए जिन पराक्रमियों के उदाहरण इतिहास में और गौरव गाथाओं में दिए जाते है उनमें मेवाड़ (चित्तौड़) के पूर्व शासक महाराणा सांगा का जिक्र अवश्य होता है।
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जिन्होंने दी चित्तौड़ को पहचान, उनसे ही हम अनजान



चित्तौडग़ढ़. देश में शौर्य का बखान करने के लिए जिन पराक्रमियों के उदाहरण इतिहास में और गौरव गाथाओं में दिए जाते है उनमें मेवाड़ (चित्तौड़) के पूर्व शासक महाराणा सांगा का जिक्र अवश्य होता है। कुंभा-सांगा की वीरता के किस्से हर किसकी जुबां पर रहते है। शरीर पर अस्सी घाव होने के बावजूद युद्ध मैदान में डटे रहने वाले राणा सांगा चित्तौैडग़ढ़ के इतिहास में महत्वपूर्ण शासक माने जाते है। भारत में मुगलों के प्रवेश को रोकने के लिए वर्ष १५२७ में खानवा के युद्ध में गंभीर घायल हो जाने वाले महाराणा सांगा की मृत्यु इतिहास में ३० जनवरी १९२८ को होना बताया गया है। सांगा की मृत्यु को करीब ५०० वर्ष होने आए है लेकिन हकेीकत ये है कि देश-दुनिया का इतिहास जानने का दावा करने वाले अधिकतर चित्तौडग़ढ़वासी भी इस बात से अनजान है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के दिन ही शूरवीर सांगा की भी पुण्यतिथि है। स्वाधीनता के बाद वर्ष १९६९ में चित्तौडग़ढ़ में महाराणा सांगा के नाम पर राणा सांगा बाजार भी स्थापित किया गया। बाजार वर्तमान में अपनी स्थापना की स्वर्णजयंति मना रहा है लेकिन वहां के अधिकतर व्यापारी भी ये नहीं जानते है कि जिसके नाम पर बने बाजार में वे व्यवसाय करते है उनकी जन्म या पुण्यतिथि कब आती है। हॉलाकि बाजार में एक पार्क में राणा सांगा की प्रतिमा अवश्य लगी हुई है लेकिन सार-संभाल के अभाव में वे उपेक्षित है।
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श्रद्धाजंलि भी नहीं दी जाती
चित्तौडग़ढ़ जिले में महाराणा प्रताप की जयंति एवं पुण्यतिथि पर विभिन्न संगठनों की ओर से कई आयोजन होते है लेकिन महाराणा सांगा की पुण्यतिथि पर श्रद्धाजंलि देने की परम्परा अब तक विकसित नहीं हो पाई है। राणा सांगा बाजार के पार्क में लगी सांगा की प्रतिमा पर भी जौहर श्रद्धाजंलि समारोह के जुलूस के दौरान ही श्रद्धाजंलि दी जाती है। पुण्यतिथि पर अब तक कोई श्रद्धाजंलि देने नहीं आया है।
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मेवाड़ के इतिहास में सांगा का क्या स्थान
इतिहास में महाराणा सांगा का जन्म १२ अप्रेल १४८२ को माना जाता है। उनका मूल नाम संग्राम सिंह था। इतिहास में माना जाता है कि मेवाड़ का गौरव बढ़ाने के लिए निरन्तर युद्धों में सक्रिय रहने वाले सांगा के शरीर पर ८० घाव हो गए थे। उन्होंने ही मुगलवंश के संस्थापक बाबर के भारत में प्रवेश करने पर उसे चुनौती दी। उनका सामना १५२७ में खानवा के युद्ध में हुआ था। महाराणा सांगा की पत्नी रानी कर्णावती का भी इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। कृष्ण भक्ति की प्रतीक मीरा भी राणा सांगा की पुत्रवुध थी।
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ये सही है कि राणा सांगा की पुण्यतिथि के बारे में अधिकतर लोगों को जानकारी कम है लेकिन सांगा हमारे मेवाड़ के ऐसे शूरवीर शासक रहे जिन्हें कोई नहीं भूला सकता। राणा सांगा की स्मृतियों को कैसे अधिक पहचान दी जाए इसके लिए संस्थान भी विचार करेंगा। पुण्यतिथि पर श्रद्धाजंलि देने की परम्परा कायम होनी चाहिए।
तख्तसिंह सोलंकी, अध्यक्ष, जौहर स्मृति संस्थान, चित्तौडग़ढ़
राणा सांगा की पुण्यतिथि मनाने की परम्परा नहीं है। ऐसे में मॉर्केट समिति की ओर से कोई आयोजन नहीं होता। राणा सांगा के इतिहास व वीरता से सभी को परिचित कराने की जरूरत है।
रतनलाल डांगी, अध्यक्ष, राणा सांगा मॉर्केट निर्माण सहकारी समिति

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