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दुर्ग की दीवारों को कमजोर कर रहे झाड़-झंखाड़

आन-बान और शान से सीना तानकर खड़े चित्तौड़ के मजबूत दुर्ग पर इसके स्वर्णिम इतिहास की बदौलत भले ही विश्व विरासत की मुहर लग गई हों, लेकिन विश्व की इस प्रमुख थाती के स्मारक कमजोर होती दीवारों के आगे बेबस हैं। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इनके संरक्षण को लेकर बे-परवाह नजर आ रहा है।

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दुर्ग की दीवारों को कमजोर कर रहे झाड़-झंखाड़

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चित्तौडग़ढ़.
दुर्ग पर जाने के लिए प्रथम प्रवेश द्वार पाडन पोल में घुसते ही सातवीं शती ई. में निर्मित दीवारें अपनी कमजोरी बयां करती नजर आती हैं। कारण साफ है कि एक तो इन दीवारों पर लगे पत्थरों की पकड़ कमजोर हो रही है, दूजा इन पर उग आए झाड़-झंखाड़ और पौधे इन्हें कमजोर कर रहे हैं। दुर्ग के व्यूह पॉइन्ट पर खड़े होकर देशी-विदेशी पर्यटक चित्तौड़ शहर को निहारते हैं। व्यूह पॉइन्ट की दीवारों के बाहरी हिस्से पर भी झाडिय़ां और पौधे उग आए हैं।
चित्तौड़ के इतिहास में राणा कुंभा का नाम शौर्यवीर के रूप में जाना जाता है, लेकिन कुंभा महल के गोखड़ों पर भी उग रहे झाड़-झंखाड़ स्मारकों की देखरेख को लेकर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की कार्य प्रणाली पर सवाल खड़े कर रहे हैं। यहां पहुंचने वाले सैलानियों को महल में खड़े होकर कुंभा के शौर्य की गााथाएं सुनाई जाती है, वहां अब मवेशियों का विचरण आम हो गया है। महल में खड़े पर्यटकों को जब बताया जाता है कि इस दुर्ग को विश्व धरोहर में शामिल कर लिया है और तभी उनकी नजर वहां फर्श पर पड़े गोबर पर पड़ती है तब पर्यटकों की मनोस्थिति क्या होती होगी, यह स्वत: स्पष्ट है। नागचण्डेश्वर मन्दिर के आगे भागसी दरवाजे पर भी अर्से से उग रहे घास-फूस से इस दरवाजे का अस्तित्व भी लगभग समाप्त होने को है।
यह है इतिहास
चित्तौड़ दुर्ग का निर्माण सातवीं शती ई. में मोरी वंश के राजा चित्रांगद ने करवाया था और इसके बाद १४३३-६८ ई. के बीच महाराणा कुंभा ने यहां कई मन्दिरों और भवनों में परिवर्तन कराया था। यह विशालतम किलों में से एक माना जाता है और इसीलिए सदियों से यह कहावत भी है कि 'गढ़ तो चित्तौड़ गढ़ बाकी सब गढैय्याÓ। इसके बावजूद दुर्ग अपनी अनदेखी का दंश झेल रहा है।


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