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चित्तौड़ में बढा पक्षी प्रेम का क्रेज, भरोसा ऐसा कि हथेली पर चुगने लगे दाना

भरोसा एक ऐसा शब्द है, जिसको जीतने में कई बार तो बरसों लग जाते हैं और यदि जीत लो तो जीवन में आनन्द के रंग भर जाते हैं।

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चित्तौडग़ढ़
भरोसा एक ऐसा शब्द है, जिसको जीतने में कई बार तो बरसों लग जाते हैं और यदि जीत लो तो जीवन में आनन्द के रंग भर जाते हैं।
चित्तौडग़ढ़ में मधुवन इलाके के एक पक्षी प्रेमी सतीश बैरागी ने लॉक डाउन के समय का उपयोग गौरेया और अन्य पक्षियों का भरोसा जीतने में किया। खासी मेहनत तो हुई पर उसका परिणाम भी सामने आया। बैरागी ने पक्षियों का भरोसा इस कदर जीता कि आज गौरेया और टिटहरी जैसे पक्षी उनकी हथेली पर दाना चुगते देखे जा सकते हैं। मधुवन इलाके में किसी समय पांच-पच्चीस गौरेया ही देखने को मिलते थे, लेकिन अब यहां इनकी तादात बढकर करीब साढे चार सौ तक पहुंच गई है। बैरवा ने अपने मकान के बाहर दीवार पर गौरेया के लिए प्लाई से घरोंदे भी बनाए हैं, जहां अब तक कितनी ही बार इनके कुनबे में इजाफा हो चुका हैं। पक्षियों के लिए दाने-पानी की भी माकूल व्यवस्था की गई है। बैरागी ने बताया कि वर्ष 2018 में उन्होंने पक्षियों की सेवा करने का मानस बनाया और हर दिन दाना डालने का क्रम शुरू हुआ। पक्षियों का भरोसा जीतने में उन्हें पूरे तीन साल लग गए।

1910 में हुई थी गौरेया दिवस की शुरुआत
बदलते पर्यावरण में गौरेया सहित अन्य पक्षियों के अस्तित्व पर भी अब खतरा मंडराने लगा है। कभी घरों में चहकती मिलती गौरेया अब घरों से गायब होती जा रही है। यह चिन्ता का विषय है। अन्तरराष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से वर्ष 1910 में पहली बार विश्व गौरेया दिवस की शुरुआत हुई थी। अब हर साल 20 मार्च को यह दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष विश्व गौरेया दिवस का विषय आई लव स्पैरो रखा गया है। गौरैया या घरेलू चिडिय़ा घरों के आसपास चहचहाने वाली छोटी सी चिडिय़ा है जिसे अंग्रेजी में हाउस स्पैरो और वैज्ञानिक भाषा में पेसर डोमेस्टिकस कहा जाता हैं। यह पक्षी मानवीय आबादी के नजदीक ही रहता हैं और घरों में ही घोंसले बनाता हैं। बेथलहम में एक गुफा से मिले 4 लाख साल पहले के जीवाश्म साक्ष्य से पता चलता है कि घरेलू गौरैया ने आदिमानव के साथ ही रहना शुरू कर दिया था।

जैव विविधता में सहयोग
गौरैया शहरी और ग्रामीण प्राकृतिक जैव विविधता व खाद्य श्रृंखला का महत्वपूर्ण सदस्य है और पारिस्थितिक संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। शोधकर्ताओं ने गौरेया को एक दिन में 270 बार अपने घोंसले में बच्चों के लिए छोटे कीटों को लाते हुए रिकॉर्ड किया हैं। यह हानिकारक कीट पतंगों के जैविक नियन्त्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं ।

संख्या में गिरावट की वजह
पहले घरों में इन पक्षियों के घोंसला बनाने और आने जाने की सुविधा होती थी पर अब ऐसे मकान बनाने का प्रचलन हो गया हैं जिसमें यह पक्षी घोंसला बनाना तो दूर, घर में प्रवेश तक नही कर पाते हैं। जिससे इनके प्रजनन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा हैं। रसायनिक प्रदूषण भी इनकी घटती संख्या के मुख्य कारण हैं। देश में पाई जाने वाली पक्षी प्रजातियों के संरक्षण की स्थिति का आकलन करने के लिए बनाई गई स्टेट ऑफ इंडियाज बड्र्स रिपोर्ट 2020 में शहरों में गौरेया की संख्या में अत्यधिक कमी बताई गई हैं।

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