
मरमी माता शक्तिपीठ, पत्रिका फोटो
Marmi Mata Fair: जिले की राशमी तहसील स्थित प्रसिद्ध मरमी माता शक्तिपीठ आज लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। कभी एक छोटे से चबूतरे के रूप में पहचाने जाने वाला यह स्थान अब भव्य मंदिर और विशाल मेले के रूप में विस्तारित हो चुका है। मान्यता है कि इस मेले की नींव करीब 60 वर्ष पूर्व एक दैवीय स्वप्न के साथ रखी गई थी। तहसील में दशहरे के दिन किसानों के नहीं आने के कारण रावण दहन का कार्यक्रम एकादशी को आयोजित किया जाने लगा, जो आज भी जारी है।
ग्रामीणों के अनुसार, लसाड़िया खुर्द निवासी शंकर लाल पारीक माता के परम भक्त थे। करीब छह दशक पहले माता ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर यहां मेला आयोजित करने का आदेश दिया। इसके बाद पारीक ने स्वयं के खर्च पर मेले की शुरुआत की। उन्होंने ही मेले में डोलर (झूले) लगवाने और दशहरे पर रावण दहन की परंपरा को जन्म दिया। धीरे-धीरे इस आयोजन के साथ घुड़दौड़, खेलकूद, गवरी नृत्य और अखाड़ा प्रदर्शन जैसी सांस्कृतिक गतिविधियां जुड़ती गईं।
क्षेत्र के किसानों की व्यस्तता को देखते हुए यहां एक अनूठी परंपरा विकसित हुई। दशहरे के दिन किसानों के नहीं आने के कारण रावण दहन का कार्यक्रम एकादशी को आयोजित किया जाने लगा, जो आज भी जारी है। वर्तमान में आसोज नवरात्र के दौरान यहां तीन दिवसीय भव्य मेला भरता है, जिसमें सांस्कृतिक कार्यक्रमों और आर्केस्ट्रा की धूम रहती है।
शक्तिपीठ के विकास में रावणा राजपूत समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिन्होंने शुरुआती दौर में माता के चबूतरे का विस्तार कर इसे पक्का स्वरूप दिया। आज यहां हर समाज की धर्मशालाएं बन चुकी हैं। पूर्व प्रधान भैरूलाल पारीक के प्रयासों से गुरु गोलवलकर योजना के तहत मेला मैदान की चारदीवारी का निर्माण कराया गया।
मरमी माता की ख्याति अब राजस्थान के भीलवाड़ा, राजसमंद, उदयपुर, अजमेर और कोटा के साथ-साथ मध्यप्रदेश व गुजरात तक फैली हुई है। विशेष रूप से लकवा पीड़ितों के बीच यह स्थान अत्यंत श्रद्धा का केंद्र है। चैत्र और आसोज, दोनों नवरात्रों में यहां घट स्थापना होती है, लेकिन आसोज नवरात्र में भीड़ अधिक रहती है। कई बीमार लोग 9 दिनों तक यहीं माता की शरण में रहकर स्वास्थ्य लाभ की कामना करते हैं।
Published on:
22 Mar 2026 10:12 am
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